प्रेम Poetry (page 80)

याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है

ज़फ़र

या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद

ज़फ़र

पान की सुर्ख़ी नहीं लब पर बुत-ए-ख़ूँ-ख़्वार के

ज़फ़र

पान खा कर सुर्मा की तहरीर फिर खींची तो क्या

ज़फ़र

निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

मोहब्बत चाहिए बाहम हमें भी हो तुम्हें भी हो

ज़फ़र

मैं हूँ आसी कि पुर-ख़ता कुछ हूँ

ज़फ़र

क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ

ज़फ़र

काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दी

ज़फ़र

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में

ज़फ़र

हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए

ज़फ़र

किसी के जाल में आ कर मैं अपना दिल गँवा बैठा

बाबर रहमान शाह

आतिश-ए-इश्क़ जब जलाती है

बाबर रहमान शाह

तुम को मैं जब सलाम करता हूँ

बाबर रहमान शाह

किसी के जाल में आ कर मैं अपना दिल गँवा बैठा

बाबर रहमान शाह

दिल ने हम से अजब ही काम लिया

बाबर रहमान शाह

दरीदा-पैरहनों में शुमार हम भी हैं

अज़्म शाकरी

अपने दुख-दर्द का अफ़्साना बना लाया हूँ

अज़्म शाकरी

मैं ने कल ख़्वाब में आइंदा को चलते देखा

अज़्म बहज़ाद

खुलता नहीं कि हम में ख़िज़ाँ-दीदा कौन है

अज़्म बहज़ाद

ये ख़ज़ाने का कोई साँप बना होता है

अज़लान शाह

तू आ गया है तो अब याद भी नहीं मुझ को

अज़लान शाह

ज़रा सी देर में कश्कोल भरने वाला था

अज़लान शाह

ये ख़ज़ाने का कोई साँप बना होता है

अज़लान शाह

पीरी नहीं चलती कि फ़क़ीरी नहीं चलती

अज़लान शाह

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