प्रेम Poetry (page 79)

ज़ेर-ए-ज़मीं हूँ तिश्ना-ए-दीदार-ए-यार का

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वहशत में भी रुख़ जानिब-ए-सहरा न करेंगे

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

पर्दा उलट के उस ने जो चेहरा दिखा दिया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

न रहे नामा ओ पैग़ाम के लाने वाले

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

रस्म-ए-सज्दा भी उठा दी हम ने

बाक़ी सिद्दीक़ी

सामने सब के न बोलेंगे हमारा क्या है

बाक़ी अहमदपुरी

ऐ इश्क़ तू हर-चंद मिरा दुश्मन-ए-जाँ हो

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

मुझे तो इश्क़ में अब ऐश-ओ-ग़म बराबर है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दस्त-ए-नासेह जो मिरे जेब को इस बार लगा

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

कभी तो याद के गुल-दान में सजाऊँ उसे

बाक़र नक़वी

मुझे दुश्मन से अपने इश्क़ सा है

बाक़र मेहदी

काफ़िरी इश्क़ का शेवा है मगर तेरे लिए

बाक़र मेहदी

क्या ख़बर थी कि कभी बे-सर-ओ-सामाँ होंगे

बाक़र मेहदी

फ़रेब खा के भी शर्मिंदा-ए-सुकूँ न हुए

बाक़र मेहदी

दर्द-ए-दिल आज भी है जोश-ए-वफ़ा आज भी है

बाक़र मेहदी

चाहा बहुत कि इश्क़ की फिर इब्तिदा न हो

बाक़र मेहदी

अब ख़ानुमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं

बाक़र मेहदी

क्यूँ कर न ऐसे जीने से या रब मलूल हूँ

बाक़र आगाह वेलोरी

दिल में दिलदार निहाँ था मुझे मा'लूम न था

बाक़र आगाह वेलोरी

सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच

कितना भी मुस्कुराइए दिल है मगर बुझा बुझा

बनो ताहिरा सईद

जो है चश्मा उसे सराब करो

बकुल देव

दिल से बे-सूद और जाँ से ख़राब

बकुल देव

बारिशों में अब के याद आए बहुत

बकुल देव

रुख़-ए-हयात है शर्मिंदा-ए-जमाल बहुत

बख़्श लाइलपूरी

जो है याँ अासाइश-ए-रंज-ओ-मेहन में मस्त है

बहराम जी

हम अपना इश्क़ चमकाएँ तुम अपना हुस्न चमकाओ

ज़फ़र

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

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