जान Poetry (page 13)

आओ कि अभी छाँव सितारों की घनी है

शोहरत बुख़ारी

ज़िंदा रहे तो हम को न पहचान दी गई

शमशाद शाद

दिल पर सितम हज़ार करे बेवफ़ा के लब

शमशाद शाद

हुआ जब जल्वा-आरा आप का ज़ौक़-ए-ख़ुद-आराई

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

पूछते क्या हो जो हाल-ए-शब-ए-तन्हाई था

शिबली नोमानी

वो जब तक अंजुमन में जल्वा फ़रमाने नहीं आते

शेर सिंह नाज़ देहलवी

मेहरबाँ पाते नहीं तेरे तईं यक आन हम

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

दियत इस क़ातिल-ए-बे-रहम से क्या लीजिएगा

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

तू जान है हमारी और जान है तो सब कुछ

ज़ौक़

क्या देखता है हाथ मिरा छोड़ दे तबीब

ज़ौक़

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी

ज़ौक़

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है

ज़ौक़

दिल बचे क्यूँकर बुतों की चश्म-ए-शोख़-ओ-शंग से

ज़ौक़

बादाम दो जो भेजे हैं बटवे में डाल कर

ज़ौक़

जहाँ पे बसना है मुझ को अब वो जहान ईजाद हो रहा है

शहज़ाद रज़ा लम्स

इस क़दर ख़ुद पे हम जफ़ा न करें

शहज़ाद रज़ा लम्स

मह्व हूँ मैं जो उस सितमगर का

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

कम-फ़हम हैं तो कम हैं परेशानियों में हम

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल का गिला फ़लक की शिकायत यहाँ नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है

शाज़ तमकनत

ख़ुद अपना हाल दिल-ए-मुब्तला से कुछ न कहा

शाज़ तमकनत

उर्दू ज़बान

शायर अली शायर

ज़बानें चुप रहें लेकिन मिज़ाज-ए-यार बोलेगा

शायान क़ुरैशी

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

हालात के कोहना दर-ओ-दीवार से निकलें

शायान क़ुरैशी

तुम्हें हुस्न ने पुर-जफ़ा कर दिया

शौक़ देहलवी मक्की

देखते हैं जब कभी ईमान में नुक़सान शैख़

शौक़ बहराइची

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