चलो चलें Poetry

दिल्ली पे क़ुर्बान

इज़हार मलीहाबादी

टीपू-सुल्तान

इज्तिबा रिज़वी

मुर्ग़-ए-मरहूम

असद जाफ़री

चारों तरफ़ हैं ख़ार-ओ-ख़स दश्त में घर है बाग़ सा

ज़ुबैर शिफ़ाई

कितने ही फ़ैसले किए पर कहाँ रुक सका हूँ मैं

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

हम

ज़िया जालंधरी

अबुल-हौल

ज़िया जालंधरी

फ़रिश्ते इम्तिहान-ए-बंदगी में हम से कम निकले

ज़िया फ़तेहाबादी

कुफ़्र में भी हम रहे क़िस्मत से ईमाँ की तरफ़

ज़हीर देहलवी

वादी-ए-नील

यूसुफ़ ज़फ़र

कभी दर्द-आश्ना तेरा भी क़ल्ब शादमाँ होगा

वासिफ़ देहलवी

चश्म-ए-यक़ीं से देखिए जल्वा-गह-ए-सिफ़ात में

वक़ार बिजनोरी

तिरे आशुफ़्ता से क्या हाल-ए-बेताबी बयाँ होगा

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

निगाहें नीची रखते हैं बुलंदी के निशाँ वाले

तुर्फ़ा क़ुरैशी

कहाँ है तू कहाँ है और मैं हूँ

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

सूफ़ी तबस्सुम

हर हर वरक़ पे क्यूँ कि लिखूँ दास्तान-ए-हिज्र

सिराज औरंगाबादी

जिस को जाना था कल तक ख़ुदा की तरह

शोला हस्पानवी

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

जहाँ पे बसना है मुझ को अब वो जहान ईजाद हो रहा है

शहज़ाद रज़ा लम्स

है बद बला किसी को ग़म-ए-जावेदाँ न हो

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

रक़ाबतों की तरह से हम ने मोहब्बतें बे-मिसाल की हैं

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

हुस्न की बिजलियाँ अल-अमाँ अल-अमाँ

शम्स इटावी

मैं वापस आऊँगा

शहराम सर्मदी

वो एक लम्हा-ए-रफ़्ता भी क्या बुला लाया

शहराम सर्मदी

रगों में रात से ये ख़ून सा रवाँ है क्या

शहराम सर्मदी

बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है

शाहिद ज़की

दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर

शाह नसीर

दम-ए-ता'मीर तख़रीब-ए-जहाँ कुछ और कहती है

शायर फतहपुरी

जफ़ा-शिआ'र भी हो कोई मेहरबाँ भी रहे

शाद बिलगवी

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