चलो चलें Poetry (page 66)

रूह लबों तक आ कर सोचे

अहमद नदीम क़ासमी

लज़्ज़त-ए-आगही

अहमद नदीम क़ासमी

तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ

अहमद नदीम क़ासमी

तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ

अहमद नदीम क़ासमी

जो लोग दुश्मन-ए-जाँ थे वही सहारे थे

अहमद नदीम क़ासमी

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

शाम-ए-ग़म याद है कब शम्अ' जली याद नहीं

अहमद मुश्ताक़

कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है

अहमद मुश्ताक़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

नहीं आसमाँ तिरी चाल में नहीं आऊँगा

अहमद महफ़ूज़

किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए

अहमद महफ़ूज़

बदन-सराब न दरिया-ए-जाँ से मिलता है

अहमद महफ़ूज़

ज़िंदा रहने का तक़ाज़ा नहीं छोड़ा जाता

अहमद कामरान

ये लग रहा है रग-ए-जाँ पे ला के छोड़ी है

अहमद कमाल परवाज़ी

उस के लहजे का वो उतार चढ़ाओ

अहमद जावेद

मौजूद हैं कितने ही तुझ से भी हसीं कर के

अहमद जावेद

मगर वो दिया ही नहीं मान कर के

अहमद जावेद

वो बुत परी है निकालें न बाल-ओ-पर ता'वीज़

अहमद हुसैन माइल

क्यूँ शौक़ बढ़ गया रमज़ाँ में सिंगार का

अहमद हुसैन माइल

हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम

अहमद हुसैन माइल

चोरी से दो घड़ी जो नज़ारे हुए तो क्या

अहमद हुसैन माइल

किस का शोअ'ला जल रहा है शो'लगी से मावरा

अहमद हमेश

नित-नए रंग से करता रहा दिल को पामाल

अहमद हमदानी

ख़याल-ओ-ख़्वाब से घर कब तलक सजाएँ हम

अहमद हमदानी

दिल तुझे पा के भी तन्हा होता

अहमद हमदानी

तअ'ना-ए-नश्शा न दो सब को कि कुछ सोख़्ता-जाँ

अहमद फ़राज़

इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है

अहमद फ़राज़

तो बेहतर है यही

अहमद फ़राज़

नामा-ए-जानाँ

अहमद फ़राज़

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