सपना Poetry (page 71)

नींद में खुलते हुए ख़्वाब की उर्यानी पर

दिलावर अली आज़र

मुमकिन है कि मिलते कोई दम दोनों किनारे

दिलावर अली आज़र

मंज़र से उधर ख़्वाब की पस्पाई से आगे

दिलावर अली आज़र

लम्हा लम्हा वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ की सैर की

दिलावर अली आज़र

कुछ भी नहीं है ख़ाक के आज़ार से परे

दिलावर अली आज़र

कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं

दिलावर अली आज़र

हवा ने इस्म कुछ ऐसा पढ़ा था

दिलावर अली आज़र

दरून-ए-ख़्वाब नया इक जहाँ निकलता है

दिलावर अली आज़र

अजीब रंग अजब हाल में पड़े हुए हैं

दिलावर अली आज़र

'आज़र' रहा है तेशा मिरे ख़ानदान में

दिलावर अली आज़र

आँख में ख़्वाब ज़माने से अलग रक्खा है

दिलावर अली आज़र

तमकीं है और हुस्न-ए-गरेबाँ है और हम

दिल शाहजहाँपुरी

क्या कहिए दास्तान-ए-तमन्ना बदल गई

दिल शाहजहाँपुरी

फिर मरहला-ए-ख़्वाब-ए-बहाराँ से गुज़र जा

दिल अय्यूबी

रह गया ख़्वाब-ए-दिल-आराम अधूरा किस का

दिल अय्यूबी

फिर मरहला-ए-ख़्वाब-ए-बहाराँ से गुज़र जा

दिल अय्यूबी

फिर वही शख़्स मिरे ख़्वाब में आया होगा

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

देखते देखते ही साल गुज़र जाता है

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

उदासी के मंज़र मकानों में हैं

देवमणि पांडेय

इस जहाँ में प्यार महके ज़िंदगी बाक़ी रहे

देवमणि पांडेय

ख़िर्क़ा-पोशी में ख़ुद-नुमाई है

दाऊद औरंगाबादी

आज बदली है हवा साक़ी पिला जाम-ए-शराब

दाऊद औरंगाबादी

इक ख़्वाब का ख़याल है दुनिया कहें जिसे

दत्तात्रिया कैफ़ी

इक ख़्वाब का ख़याल है दुनिया कहें जिसे

दत्तात्रिया कैफ़ी

जब से किसी से दर्द का रिश्ता नहीं रहा

दरवेश भारती

वो सलीक़ा हमें जीने का सिखा दे साक़ी

दर्शन सिंह

गुलों पे ख़ाक-ए-मेहन के सिवा कुछ और नहीं

दर्शन सिंह

शेल्फ़ पे उल्टा कर के रख दो और बिसरा दो

दानियाल तरीर

ख़्वाब का क्या है रात के नक़्श-ओ-निगार बनाओ

दानियाल तरीर

ख़्वाब का क्या है रात के नक़्श-ओ-निगार बनाओ

दानियाल तरीर

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