सपना Poetry (page 74)

इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया

बहज़ाद लखनवी

ये साक़ी की करामत है कि फ़ैज़-ए-मय-परस्ती है

बेदम शाह वारसी

क़फ़स की तीलियों से ले के शाख़-ए-आशियाँ तक है

बेदम शाह वारसी

बुत भी इस में रहते थे दिल यार का भी काशाना था

बेदम शाह वारसी

अपनी हस्ती का अगर हुस्न नुमायाँ हो जाए

बेदम शाह वारसी

याद में ख़्वाब में तसव्वुर में

बयान मेरठी

सर-ए-शोरीदा पा-ए-दश्त-ए-पैमा शाम-ए-हिज्राँ था

बयान मेरठी

ख़ूँ बहाने के हैं हज़ार तरीक़

बयान मेरठी

ज़ुल्फ़ तेरी ने परेशाँ किया ऐ यार मुझे

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

पूछता कौन है डरता है तू ऐ यार अबस

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

न फ़क़त यार बिन शराब है तल्ख़

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले

बासित भोपाली

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी

बशीर ज़ैदी असीर

भूला-बिसरा ख़्वाब हुए हम

बशीर सैफ़ी

वो कभी शाख़-ए-गुल-ए-तर की तरह लगता है

बशीर फ़ारूक़

नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं

बशीर बद्र

उदास रात है कोई तो ख़्वाब दे जाओ

बशीर बद्र

प्यार की नई दस्तक दिल पे फिर सुनाई दी

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा

बशीर बद्र

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते

बशीर बद्र

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा

बशीर बद्र

वक़्त के कटहरे में

बशर नवाज़

तो ऐसा क्यूँ नहीं करते

बशर नवाज़

ना-रसा

बशर नवाज़

सारे मंज़र फ़ुसूँ तमाशा हैं

बशर नवाज़

कोई सनम तो हो कोई अपना ख़ुदा तो हो

बशर नवाज़

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