भगवान Poetry (page 55)

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा है

भारतेंदु हरिश्चंद्र

कुछ न कुछ सिलसिला ही बन जाता

भारत भूषण पन्त

अक़्ल दौड़ाई बहुत कुछ तो गुमाँ तक पहुँचे

बेताब अज़ीमाबादी

हमें इस्लाम उसे इतना तअल्लुक़ है अभी बाक़ी

बेख़ुद देहलवी

दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा

बेख़ुद देहलवी

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

वो और तसल्ली मुझे दें उन की बला दे

बेख़ुद देहलवी

सब्र आता है जुदाई में न ख़्वाब आता है

बेख़ुद देहलवी

मुँह फेर कर वो कहते हैं बस मान जाइए

बेख़ुद देहलवी

मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद

बेख़ुद देहलवी

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

झूट सच आप तो इल्ज़ाम दिए जाते हैं

बेख़ुद देहलवी

हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा

बेख़ुद देहलवी

हज़रत-ए-दिल ये इश्क़ है दर्द से कसमसाए क्यूँ

बेख़ुद देहलवी

ऐसा बना दिया तुझे क़ुदरत ख़ुदा की है

बेख़ुद देहलवी

अब किसी बात का तालिब दिल-ए-नाशाद नहीं

बेख़ुद देहलवी

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप

बेख़ुद देहलवी

क्यूँ मैं अब क़ाबिल-ए-जफ़ा न रहा

बेखुद बदायुनी

इस बज़्म में न होश रहेगा ज़रा मुझे

बेखुद बदायुनी

हैं वस्ल में शोख़ी से पाबंद-ए-हया आँखें

बेखुद बदायुनी

नज़र की फ़त्ह कभी क़ल्ब की शिकस्त लगे

बेकल उत्साही

आता है जो तूफ़ाँ आने दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है

बहज़ाद लखनवी

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है

बहज़ाद लखनवी

ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला

बहज़ाद लखनवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

बहज़ाद लखनवी

भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे

बेदिल हैदरी

कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं

बेदम शाह वारसी

तुम ख़फ़ा हो तो अच्छा ख़फ़ा हो

बेदम शाह वारसी

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