भगवान Poetry (page 54)
काएनात-ए-आरज़ू में हम बसर करने लगे
चित्रांश खरे
एक मरकज़ पे सिमट आई है सारी दुनिया
चरण सिंह बशर
गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़
चकबस्त ब्रिज नारायण
रामायण का एक सीन
चकबस्त ब्रिज नारायण
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है
चकबस्त ब्रिज नारायण
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं
चकबस्त ब्रिज नारायण
मेरे ख़ामोश ख़ुदा
बुशरा एजाज़
संग को छोड़ के तू ने कभी सोचा ही नहीं
बबल्स होरा सबा
जब ख़िज़ाँ आई चमन में सब दग़ा देने लगे
बूम मेरठी
मोहब्बत में ख़ुदा जाने हुईं रुस्वाइयाँ किस से
बिस्मिल सईदी
किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत 'बिस्मिल'
बिस्मिल सईदी
रह-रव-ए-राह-ए-मोहब्बत कौन सी मंज़िल में है
बिस्मिल सईदी
उगल न संग-ए-मलामत ख़ुदा से डर नासेह
बिस्मिल अज़ीमाबादी
हो न मायूस ख़ुदा से 'बिस्मिल'
बिस्मिल अज़ीमाबादी
'बिस्मिल' बुतों का इश्क़ मुबारक तुम्हें मगर
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ये बुत फिर अब के बहुत सर उठा के बैठे हैं
बिस्मिल अज़ीमाबादी
रुख़ पे गेसू जो बिखर जाएँगे
बिस्मिल अज़ीमाबादी
मेरी दुआ कि ग़ैर पे उन की नज़र न हो
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ख़िज़ाँ के जाने से हो या बहार आने से
बिस्मिल अज़ीमाबादी
चमन को लग गई किस की नज़र ख़ुदा जाने
बिस्मिल अज़ीमाबादी
ख़याल को ज़ौ नज़र को ताबिश नफ़स को रख़शंदगी मिलेगी
बिर्ज लाल रअना
नज़्म
बिमल कृष्ण अश्क
दहशत-ज़दा ज़मीं पर वहशत भरे मकाँ ये
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
मिरी हथेली में लिक्खा हुआ दिखाई दे
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर
बिलाल अहमद
मुश्किल
बिलाल अहमद
बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा हो
भारतेंदु हरिश्चंद्र
उठा के नाज़ से दामन भला किधर को चले
भारतेंदु हरिश्चंद्र
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