किरण Poetry (page 2)

लगाएँ आग ही दिल में कि कुछ उजाला हो

वजद चुगताई

हुस्न की ज़बान से

वहीदुद्दीन सलीम

ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

वहीद अख़्तर

एक किरन फिर मुझ को वापस खींच गई

विकास शर्मा राज़

ज़र्रों की बातों में आने वाला था

विकास शर्मा राज़

वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है

उम्मीद फ़ाज़ली

बसंत और होली की बहार

उफ़ुक़ लखनवी

आइना मिलता तो शायद नज़र आते ख़ुद को

तौसीफ़ तबस्सुम

दूर तक परछाइयाँ सी हैं रह-ए-अफ़्कार पर

तख़्त सिंह

वही बे-लिबास क्यारियाँ कहीं बेल बूटों के बल नहीं

तफ़ज़ील अहमद

पहाड़ों को बिछा देते कहीं खाई नहीं मिलती

तफ़ज़ील अहमद

एक लम्बी काफ़िर लड़की

तबस्सुम काश्मीरी

मंज़िलों उस को आवाज़ देते रहे मंज़िलों जिस की कोई ख़बर भी न थी

ताब असलम

क़ाज़ी के मुँह पे मारी है बोतल शराब की

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ऐब्स्ट्रैक्ट आर्ट

सय्यद मोहम्मद जाफ़री

ये किताबों सी जो हथेली है

स्वप्निल तिवारी

सुनहरी धूप खिली है कई दिनों के ब'अद

सुनील आफ़ताब

लब-ए-इज़हार पे जब हर्फ़-ए-गवाही आए

सिब्त अली सबा

आँधी चली तो गर्द से हर चीज़ अट गई

सिब्त अली सबा

ये धुँद ये ग़ुबार छटे तो पता चले

शोएब निज़ाम

गीली मिट्टी से बदन बनते हुए उम्र लगी

शमशाद शाद

आसमाँ तुझ से किनारा कहीं करना है मुझे

शहज़ाद रज़ा लम्स

नफ़रत और मोहब्बत

शीरीं अहमद

वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए

शाज़ तमकनत

हमारे सर हर इक इल्ज़ाम धर भी सकता है

शारिब मौरान्वी

सब्ज़ सूरज की किरन

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

आँखों में हिज्र चेहरे पे ग़म की शिकन तो है

शमीम रविश

खंडर

शमीम करहानी

वहाँ खुले भी तो क्यूँकर बिसात-ए-हिकमत-ओ-फ़न

शमीम करहानी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

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