होंठ Poetry (page 15)

सौ बार बोसा-ए-लब-ए-शीरीं वो दे तो लूँ

शाह नसीर

बोसा-ए-ख़ाल-ए-लब-ए-जानाँ की कैफ़िय्यत न पूछ

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ छुटती तिरे रुख़ पर तो दिल अपना फिरता

शाह नसीर

याँ से देंगे न तुम को जाने आज

शाह नसीर

उधर अब्र ले चश्म-ए-नम को चला

शाह नसीर

सुब्ह-ए-गुलशन में हो गर वो गुल-ए-ख़ंदाँ पैदा

शाह नसीर

पामाल-ए-राह-ए-इश्क़ हैं ख़िल्क़त की खा ठोकर भी हम

शाह नसीर

न दिखाइयो हिज्र का दर्द-ओ-अलम तुझे देता हूँ चर्ख़-ए-ख़ुदा की क़सम

शाह नसीर

मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता

शाह नसीर

कुछ सरगुज़िश्त कह न सके रू-ब-रू क़लम

शाह नसीर

जो गुज़रे है बर आशिक़-ए-कामिल नहीं मालूम

शाह नसीर

जो ऐन वस्ल में आराम से नहीं वाक़िफ़

शाह नसीर

हाथों को उठा जान से आख़िर को रहूँगा

शाह नसीर

इक क़ाफ़िला है बिन तिरे हम-राह सफ़र में

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

दम ले ऐ कोहकन अब तेशा-ज़नी ख़ूब नहीं

शाह नसीर

छोड़ा न तुझे ने राम क्या ये भी न हुआ वो भी न हुआ

शाह नसीर

बे-सबब हाथ कटारी को लगाना क्या था

शाह नसीर

बे-मेहर-ओ-वफ़ा है वो दिल-आराम हमारा

शाह नसीर

सन लेवे अगर तू मिरी दिलदार की आवाज़

शाह आसिम

कोई दम थमता नहीं बारान-ए-अश्क

शाह आसिम

इस दिल में अगर जल्वा-ए-दिल-दार न होता

शाह आसिम

अफ़्साना मिरे दिल का दिल-आज़ार से कह दो

शाह आसिम

मौसम-ए-गुल आ गया फिर दश्त-पैमाई रहे

शाग़िल क़ादरी

साहब-ए-ज़र न सही साहब-ए-इज़्ज़त हैं अभी

शफ़ीक़ सलीमी

ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है शाह की मुख़्बर लगी हुई

शफ़ीक़ सलीमी

इक पल भी मिरे हाल से ग़ाफ़िल नहीं ठहरा

शफ़ीक़ सलीमी

आ गया था एक दिन लब पर जफ़ाओं का गिला

शफ़ीक़ जौनपुरी

डूबने वाला क्या न कर डूबे

शफ़क़ सुपुरी

हम उन से कर गए हैं किनारा कभी कभी

शादाँ इंदौरी

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