लोग Poetry (page 37)

नज़्म

गोपाल मित्तल

ये लोग किस की तरफ़ देखते हैं हसरत से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बात बढ़ती गई आगे मिरी नादानी से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

वो लोग मुतमइन हैं कि पत्थर हैं उन के पास

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

वफ़ा के शहर में अब लोग झूट बोलते हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

तज़ाद

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

हम ने तो बे-शुमार बहाने बनाए हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

हर एक पल की उदासी को जानता है तो आ

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

नाला करता हूँ लोग सुनते हैं

ग़ुलाम मौला क़लक़

तेरे वादे का इख़्तिताम नहीं

ग़ुलाम मौला क़लक़

राज़-ए-दिल दोस्त को सुना बैठे

ग़ुलाम मौला क़लक़

सिसक रही हैं थकी हवाएँ लिपट के ऊँचे सनोबरों से

ग़ुलाम हुसैन साजिद

नुमूद पाते हैं मंज़रों की शिकस्त से फ़तह के बहाने

ग़ुलाम हुसैन साजिद

कोई जब छीन लेता है मता-ए-सब्र मिट्टी से

ग़ुलाम हुसैन साजिद

किस ने दी आवाज़ ''सिपर की ओट में था''

ग़ुलाम हुसैन साजिद

ज़ीस्त का ख़ाली कटोरा आप ही भर जाएगा

ग़ुलाम हुसैन अयाज़

फ़सील-ए-जिस्म की ऊँचाई से उतर जाएँ

ग़ुलाम हुसैन अयाज़

दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल अहल-ए-वफ़ा कहने लगे

ग़ुलाम हुसैन अयाज़

तुम्हारे होते हुए लोग क्यूँ भटकते हैं

ग़ज़नफ़र

किसी के नर्म तख़ातुब पे यूँ लगा मुझ को

ग़ज़नफ़र

ख़ला के दश्त से अब रिश्ता अपना क़त्अ करूँ

ग़ज़नफ़र

दर्द की कौन सी मंज़िल से गुज़रते होंगे

ग़ज़नफ़र

ख़्वाब आँखों की गली छोड़ के जाने निकले

ग़यास मतीन

हम ने जब चाहा कोई आग बुझाने आए

ग़यास अंजुम

चल दिया नाज़ ज़माने के उठाने वाला

ग़ौसिया ख़ान सबीन

आँखों में हया रख के भी बेबाक बहुत थे

ग़ौसिया ख़ान सबीन

कैसा होगा देस पिया का कैसा पिया का गाँव रे

ग़ौस सीवानी

कोई समझाओ उन्हें बहर-ए-ख़ुदा ऐ मोमिनो

ग़मगीन देहलवी

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