लोग Poetry (page 38)

मुझ से आज़ुर्दा जो उस गुल-रू को अब पाते हैं लोग

ग़मगीन देहलवी

नज़र लगे न कहीं उन के दस्त-ओ-बाज़ू को

ग़ालिब

नज़र लगे न कहीं इन के दस्त-ओ-बाज़ू को

ग़ालिब

कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं

ग़ालिब

कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग

ग़ालिब

अगले वक़्तों के हैं ये लोग इन्हें कुछ न कहो

ग़ालिब

ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं

ग़ालिब

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं

ग़ालिब

की वफ़ा हम से तो ग़ैर इस को जफ़ा कहते हैं

ग़ालिब

इश्क़ तासीर से नौमीद नहीं

ग़ालिब

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

ग़ालिब

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

ग़ालिब

बे-ए'तिदालियों से सुबुक सब में हम हुए

ग़ालिब

सुब्हों जैसे लोग

गीताञ्जलि राय

नफ़रत

गीताञ्जलि राय

एक आम वाक़िआ'

गीताञ्जलि राय

कि इस से पहले ख़िज़ाँ का शिकार हो जाऊँ

गौतम राजऋषि

बंदों का मिज़ाज हम ने देखा

गौहर होशियारपुरी

अपना दुखड़ा कहते हैं

गौहर होशियारपुरी

सर किया ज़ुल्फ़ की शब को तो सहर तक पहुँचे

ग़फ़्फ़ार बाबर

ख़ून पलकों पे सर-ए-शाम जमेगा कैसे

फ़ुज़ैल जाफ़री

है इबारत जो ग़म-ए-दिल से वो वहशत भी न थी

फ़ुज़ैल जाफ़री

दिलों के आइने धुँदले पड़े हैं

फ़ुज़ैल जाफ़री

दिल मुतमइन है हर्फ़-ए-वफ़ा के बग़ैर भी

फ़ुज़ैल जाफ़री

छू भी तो नहीं सकते हम मौज-ए-सबा बन कर

फ़ुज़ैल जाफ़री

तमाम जिस्म की परतें जुदा जुदा करके

फ़िज़ा कौसरी

तमाम जिस्म की परतें जुदा जुदा करके

फ़िज़ा कौसरी

करम के नाम पे उन का इ'ताब चाहते हैं

फ़ितरत अंसारी

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम्हें क्यूँकर बताएँ ज़िंदगी को क्या समझते हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी

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