लोग Poetry (page 40)

इस तमाशे का सबब वर्ना कहाँ बाक़ी है

फ़रियाद आज़र

सर पे हर्फ़ आता है दस्तार पे हर्फ़ आता है

फ़रताश सय्यद

हर रोज़ दिखाई दें सब लोग वहीं लेकिन

फ़र्रुख़ जाफ़री

इस राज़ के बातिन तक पहुँचा ही नहीं कोई

फ़र्रुख़ जाफ़री

याद रखते किस तरह क़िस्से कहानी लोग थे

फ़ारूक़ शफ़क़

पौ फटी एक ताज़ा कहानी मिली

फ़ारूक़ शफ़क़

खिड़कियों पर मल्गजे साए से लहराने लगे

फ़ारूक़ शफ़क़

बहुत धोका किया ख़ुद को मगर क्या कर लिया मैं ने

फ़ारूक़ शफ़क़

सुना है लोग वहाँ मुझ से ख़ार खाते हैं

फ़ारूक़ नाज़की

अपनी ग़ज़ल को ख़ून का सैलाब ले गया

फ़ारूक़ नाज़की

अजीब रंग सा चेहरों पे बे-कसी का है

फ़ारूक़ नाज़की

अंधा सफ़र

फ़ारूक़ मुज़्तर

शहर की फ़सीलों पर ज़ख़्म जगमगाएँगे

फ़ारूक़ अंजुम

परिंदे खेत में अब तक पड़ाव डाले हैं

फ़ारूक़ अंजुम

मैं मो'तबर हूँ इश्क़ मिरा मो'तबर नहीं

फ़ारूक़ अंजुम

इस क़दर महव-ए-तसव्वुर हूँ सितमगर तेरा

फ़रोग़ हैदराबादी

जन्म जन्म की कहानी

फ़रखंदा नसरीन हयात

दे रहे हैं लोग मेरे दिल पे दस्तक बार बार

फरीहा नक़वी

क्या ज़माना है ये क्या लोग हैं क्या दुनिया है

फ़ारिग़ बुख़ारी

मैं शो'ला-ए-इज़हार हूँ कोताह हूँ क़द तक

फ़ारिग़ बुख़ारी

कोई मंज़र भी सुहाना नहीं रहने देते

फ़ारिग़ बुख़ारी

लाख रहे शहरों में फिर भी अंदर से देहाती थे

फ़रहत ज़ाहिद

राज़ उबल पड़े आख़िर आसमाँ के सीनों से

फ़रहत क़ादरी

रातों के अंधेरों में ये लोग अजब निकले

फ़रहत क़ादरी

जितने लोग नज़र आते हैं सब के सब बेगाने हैं

फ़रहत क़ादरी

ये बे-कनार बदन कौन पार कर पाया

फ़रहत एहसास

ज़मीं ने लफ़्ज़ उगाया नहीं बहुत दिन से

फ़रहत एहसास

उस तरफ़ तू तिरी यकताई है

फ़रहत एहसास

पैकर-ए-अक़्ल तिरे होश ठिकाने लग जाएँ

फ़रहत एहसास

मिरे सुबूत बहे जा रहे हैं पानी में

फ़रहत एहसास

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