गंतव्य Poetry (page 35)

कहाँ मैं अभी तक नज़र आ सका हूँ

दिल अय्यूबी

हसीं है शहर तो उजलत में क्यूँ गुज़र जाएँ

दिल अय्यूबी

आज मैं ने गुनाह कर डाला

दीपक शर्मा दीप

मेरी मंज़िल कहाँ है क्या मा'लूम

द्वारका दास शोला

एक रहज़न को अमीर-ए-कारवाँ समझा था मैं

द्वारका दास शोला

वक़्त की सदियाँ

दाऊद ग़ाज़ी

जवाज़

दाऊद ग़ाज़ी

ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहीं

दत्तात्रिया कैफ़ी

रक़्स करती है फ़ज़ा वज्द में जाम आया है

दर्शन सिंह

लिबास-ए-फ़क़्र में हम को जो ख़ाकसार मिले

दर्शन सिंह

जज़्बा-ए-दिल को अमल में कभी लाओ तो सही

दर्शन सिंह

इश्क़ शबनम नहीं शरारा है

दर्शन सिंह

गुलों पे ख़ाक-ए-मेहन के सिवा कुछ और नहीं

दर्शन सिंह

दौलत मिली जहान की नाम-ओ-निशाँ मिले

दर्शन सिंह

चश्म-ए-बीना हो तो क़ैद-ए-हरम-ओ-तूर नहीं

दर्शन सिंह

ज़िंदगी कर गई तूफ़ाँ के हवाले मुझ को

दानिश अलीगढ़ी

क्या ख़बर थी मुन्हरिफ़ अहल-ए-जहाँ हो जाएँगे

दानिश अलीगढ़ी

क़रीने से अजब आरास्ता क़ातिल की महफ़िल है

दाग़ देहलवी

मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है

दाग़ देहलवी

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं

दाग़ देहलवी

भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं

दाग़ देहलवी

हम को छेड़ा तो मचल जाएँगे अरमाँ की तरह

डी. राज कँवल

ये मायूसी कहीं वज्ह-ए-सुकून-ए-दिल न बन जाए

चराग़ हसन हसरत

जो आँसुओं को न चमकाए वो ख़ुशी क्या है

चरख़ चिन्योटी

फ़ज़ा-ए-ना-उमीदी में उमीद-अफ़ज़ा पयाम आया

चरख़ चिन्योटी

तय हुआ दिन कि खुले शाम के बिस्तर चलिए

चराग़ बरेलवी

रामायण का एक सीन

चकबस्त ब्रिज नारायण

ख़ाक-ए-हिंद

चकबस्त ब्रिज नारायण

फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना

चकबस्त ब्रिज नारायण

पूछते हैं बज़्म में सुन कर वो अफ़्साना मिरा

ब्रहमा नन्द जलीस

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