मौज Poetry (page 10)

औरत

शाद आरफ़ी

चाहते हैं घर बुतों के दिल में हम

शाद आरफ़ी

अल्लाह दे सके तो दे ऐसी ज़बाँ मुझे

सीमाब सुल्तानपुरी

मेरी रिफ़अत पर जो हैराँ है तो हैरानी नहीं

सीमाब अकबराबादी

आ कि हस्ती बे-लब-ओ-बे-जोश है तेरे बग़ैर

सीमाब अकबराबादी

इश्क़ है दरिया-ए-आतिश तैर कर जाने का नाम

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

ऐ आह तिरी क़द्र असर ने तो न जानी

मोहम्मद रफ़ी सौदा

आँखों में एक ख़्वाब पस-ए-ख़्वाब और है

सऊद उस्मानी

सदाओं का समुंदर

सरवत ज़ेहरा

पत्थरों में आइना मौजूद है

सरवत हुसैन

तेरी नाराज़गी फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ है

सरताज आलम आबिदी

ग़फ़लतों का समर उठाता हूँ

सरफ़राज़ ज़ाहिद

सफ़ीना मौज-ए-बला के लिए इशारा था

सरफ़राज़ दानिश

दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है

सरदार सोज़

उन बुतों से रब्त तोड़ा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

कुछ बद-गुमानियाँ हैं कुछ बद-ज़बानियाँ हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

साक़ी फ़ारुक़ी

मिट्टी थी ख़फ़ा मौज उठा ले गई हम को

साक़ी फ़ारुक़ी

बाद-ए-निस्याँ है मिरा नाम बता दो कोई

साक़ी फ़ारुक़ी

वो गुम हुए हैं मुसाफ़िर रह-ए-तमन्ना में

समद अंसारी

वो आरज़ू कि दिलों को उदास छोड़ गई

समद अंसारी

पस-ए-निगाह कोई लौ भड़कती रहती है

सालिम सलीम

लगता है वो आज ख़्वाब जैसा

सलीम शहज़ाद

मत पूछ कि इस पैकर-ए-ख़ुश-रंग में क्या है

सलीम शाहिद

बुझ गए शो'ले धुआँ आँखों को पानी दे गया

सलीम शाहिद

तिरी निगाह की जब से मुआ'विनत न रही

सलीम सरफ़राज़

तिरी निगाह की जब से मुआवनत न रही

सलीम फ़राज़

फूलों की है तख़्लीक़ कि शो'लों से बना है

सलीम बेताब

चली है मौज में काग़ज़ की कश्ती

सलीम अहमद

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

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