मौज Poetry (page 9)

दे मुझ को भी इस दौर में साक़ी सिपर-ए-जाम

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ छुटती तिरे रुख़ पर तो दिल अपना फिरता

शाह नसीर

क़दम न रख मिरी चश्म-ए-पुर-आब के घर में

शाह नसीर

लगा जब अक्स-ए-अबरू देखने दिलदार पानी में

शाह नसीर

जुदा नहीं है हर इक मौज देख आब के बीच

शाह नसीर

इस दिल को हम-कनार किया हम ने क्या किया

शाह नसीर

हुआ अश्क-ए-गुलगूँ बहार-ए-गरेबाँ

शाह नसीर

दम ले ऐ कोहकन अब तेशा-ज़नी ख़ूब नहीं

शाह नसीर

बे-सबब हाथ कटारी को लगाना क्या था

शाह नसीर

शक़ आफ़ियत-कनार किनारे को कर गई

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

सदियों तुम्हारी याद में शमएँ जलाएँगे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

रेग-ए-रवाँ पे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न देखना

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

हम ख़राबे में बसर कर गए ख़ामोशी से

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन

शफ़क़ सुपुरी

मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन

शफ़क़ सुपुरी

ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-बदन शाम-ए-क़ज़ा से रौशन

शफ़क़ सुपुरी

ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-बदन शाम-ए-क़ज़ा से रौशन

शफ़क़ सुपुरी

चमन की ख़ाक पे मौज-ए-बला ने रक़्स किया

शफ़क़ सुपुरी

ये सनम भी घटोर कितने हैं

शाद लखनवी

क़ौल उस दरोग़-गो का कोई भी सच हुआ है

शाद लखनवी

इश्क़-ए-रुख़-ओ-ज़ुल्फ़ में किया कूच

शाद लखनवी

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा

शाद अज़ीमाबादी

ख़ुशबुओं से मिरी हर साँस को भर देता है

शबनम वहीद

अपनी तलब का नाम डुबोने क्यूँ जाएँ मय-ख़ाने तक

शायर लखनवी

नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे

शानुल हक़ हक़्क़ी

ईमा-ए-ग़ज़ल करती हैं मौसम की अदाएँ

शानुल हक़ हक़्क़ी

इधर मौसम की ये ख़ुश-एहतिमामी

शानुल हक़ हक़्क़ी

इक तमन्ना कि सहर से कहीं खो जाती है

शानुल हक़ हक़्क़ी

इक महक सी दम-ए-तहरीर कहाँ से आई

शानुल हक़ हक़्क़ी

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