मौज Poetry (page 7)
बूँद बन बन के बिखरता जाए
शीन काफ़ निज़ाम
शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है
शाज़ तमकनत
मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा
शाज़ तमकनत
क्या क़यामत है कि इक शख़्स का हो भी न सकूँ
शाज़ तमकनत
छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी
शाज़ तमकनत
उस के नाम
शौकत परदेसी
ख़ंदा-ए-मौज मिरी तिश्ना-लबी ने जाना
शरीफ़ कुंजाही
अब किसी शाख़ पे हिलता नहीं पत्ता कोई
शरीफ़ कुंजाही
जो अपनी चश्म-ए-तर से दिल का पारा छोड़ जाता है
शारिब मौरान्वी
नग़्मगी से सुकूत बेहतर था
शरीफ़ मुनव्वर
जो बात दिल में थी काग़ज़ पे कब वो आई है
शरीफ़ मुनव्वर
कनार-ए-बहर है देखूँगा मौज-ए-आब में साँप
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
खंडर
शमीम करहानी
ज़ुल्मत-गह-ए-दौराँ में सुब्ह-ए-चमन-ए-दिल हूँ
शमीम करहानी
शराब ओ शेर के साँचे में ढल के आई है
शमीम करहानी
शम्अ' पर शम्अ' जलाती हुई साथ आती है
शमीम करहानी
ज़रा भी जिस की वफ़ा का यक़ीन आया है
शमीम जयपुरी
तिरे अहल-ए-दर्द के रोज़-ओ-शब इसी कश्मकश में गुज़र गए
शमीम जयपुरी
शोला शोला थी हवा शीशा-ए-शब से पूछो
शमीम हनफ़ी
शाम के साहिल पे सूरज का सफ़ीना आ लगा
शमीम हनफ़ी
ज़िंदगी हँसती है सुब्ह-ओ-शाम तेरे शहर में
शमीम फ़तेहपुरी
नुमाइश-ए-अलीगढ़
शकील बदायुनी
उठी फिर दिल में इक मौज-ए-शबाब आहिस्ता आहिस्ता
शकील बदायुनी
उन को शरह-ए-ग़म सुनाई जाएगी
शकील बदायुनी
मिरी ज़िंदगी है ज़ालिम तिरे ग़म से आश्कारा
शकील बदायुनी
जज़्बात की रौ में बह गया हूँ
शकील बदायुनी
अभी जज़्बा-ए-शौक़ कामिल नहीं है
शकील बदायुनी
अब तक शिकायतें हैं दिल-ए-बद-नसीब से
शकील बदायुनी
रौशन हैं दिल के दाग़ न आँखों के शब-चराग़
शकेब जलाली
क्या चीज़ है ये सई-ए-पैहम क्या जज़्बा-ए-कामिल होता है
शकेब जलाली
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