मौज Poetry (page 12)

सदा अपनी रविश अहल-ए-ज़माना याद रखते हैं

सहर अंसारी

क्या किसी लम्हा-ए-रफ़्ता ने सताया है तुझे

सहर अंसारी

इस दर्जा इश्क़ मौजिब-ए-रुस्वाई बन गया

साग़र सिद्दीक़ी

नदीम-ए-दर्द-ए-मोहब्बत बड़ा सहारा है

साग़र निज़ामी

हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे

साग़र निज़ामी

क्यूँ दिल तिरे ख़याल का हामिल नहीं रहा

साग़र ख़य्यामी

बैठे हैं ऐसे ज़ुल्फ़ में कलियाँ सँवार के

साग़र ख़य्यामी

बहार आई है फिर पैरहन गुलाबी हो

सफ़दर मीर

रस्ते लपेट कर सभी मंज़िल पे लाए हैं

सईद नक़वी

जब बीनाई सावन ने चुराई हो

सईद अहमद

अधूरी नस्ल का पूरा सच

सईद अहमद

यही नहीं कि फ़क़त तिरी जुस्तुजू भी मैं

सादिक़ नसीम

उदास उदास सर-ए-साग़र-ओ-सुबू भी मैं

सादिक़ नसीम

रश्क-ए-महताब जहाँ-ताब था हर क़र्या-ए-जाँ

सादिक़ नसीम

'बेदिल' का तख़य्युल हूँ न ग़ालिब की नवा हूँ

सादिक़ नसीम

सितारे सो गए तो आसमाँ कैसा लगेगा

साबिर ज़फ़र

फूल बिखराती हर इक मौज-ए-हवा आती है

साबिर दत्त

चला-चल मोहलत-ए-आराम क्या है

सबा अकबराबादी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

दश्त की प्यास बढ़ाने के लिए आए थे

सादुल्लाह शाह

कैफ़-ए-सुरूर-ओ-सोज़ के क़ाबिल नहीं रहा

एस ए मेहदी

रहे हम आशियाँ में भी तो बर्क़-ए-आशियाँ हो कर

रियाज़ ख़ैराबादी

मुझ को लेना है तिरे रंग-ए-हिना का बोसा

रियाज़ ख़ैराबादी

दुनिया से अलग हम ने मयख़ाने का दर देखा

रियाज़ ख़ैराबादी

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया

रियाज़ ख़ैराबादी

इन्ही सुब्हों में वो इक सुब्ह-ए-नवा याद करो

रिफ़अत अब्बास

जो सोचता हूँ अगर वो हवा से कह जाऊँ

रियाज़ मजीद

सलामत आए हैं फिर उस के कूचा-ओ-दर से

राज़ी अख्तर शौक़

न फ़ासले कोई रखना न क़ुर्बतें रखना

राज़ी अख्तर शौक़

इस तरह आँखों को नम दिल पर असर करते हुए

रज़ा मौरान्वी

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