मौसम Poetry (page 26)
मुझे जीना नहीं आता
बशर नवाज़
करोगे याद तो हर बात याद आएगी
बशर नवाज़
दाग़-ए-दिल हम को याद आने लगे
बाक़ी सिद्दीक़ी
उदास बाम है दर काटने को आता है
बाक़ी अहमदपुरी
मेरी गो आह से जंगल न जले ख़ुश्क तो हो
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
खेत से बच कर गुज़रे बस्ती को वीरानी दे
बाक़र नक़वी
बहुत ज़ी-फ़हम हैं दुनिया को लेकिन कम समझते हैं!
बाक़र मेहदी
सिर्फ़ मौसम के बदलने ही पे मौक़ूफ़ नहीं
बक़ा बलूच
सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो
बक़ा बलूच
शायद
बलराज कोमल
सर्द, तारीक रात
बलराज कोमल
गिर्या-ए-सगाँ
बलराज कोमल
बारिशों में ग़ुस्ल करते सब्ज़ पेड़
बलराज कोमल
रुत न बदले तो भी अफ़्सुर्दा शजर लगता है
बख़्श लाइलपूरी
गौरय्यों ने जश्न मनाया मेरे आँगन बारिश का
बद्र-ए-आलम ख़लिश
तुम्हारे दिल में जो ग़म बसा है तो मैं कहाँ हूँ
बद्र वास्ती
फल दरख़्तों से गिरे थे आँधियों में थाल भर
बद्र वास्ती
गुम-शुदा मौसम का आँखों में कोई सपना सा था
बदनाम नज़र
नग़्मे तड़प रहे हैं दिल-ए-बे-क़रार में
बीएस जैन जौहर
किसी ख़याल की हिद्दत से जलना चाहती हूँ
अज़रा नक़वी
कितने मौसम सरगर्दां थे मुझ से हाथ मिलाने में
अज़्म बहज़ाद
कितने मौसम सरगर्दां थे मुझ से हाथ मिलाने में
अज़्म बहज़ाद
मुजस्समा
अज़ीज़ तमन्नाई
ज़मीं की आँख से मंज़र कोई उतारते हैं
अज़ीज़ नबील
सुनो मुसाफ़िर! सराए-जाँ को तुम्हारी यादें जला चुकी हैं
अज़ीज़ नबील
परिंदे झील पर इक रब्त-ए-रूहानी में आए हैं
अज़ीज़ नबील
आएँगे नज़र सुब्ह के आसार में हम लोग
अज़ीज़ नबील
सलीब ओ दार के क़िस्से रक़म होते ही रहते हैं
अज़ीज़ हामिद मदनी
हरम का आईना बरसों से धुँदला भी है हैराँ भी
अज़ीज़ हामिद मदनी
ज़िंदगी के सारे मौसम आ के रुख़्सत हो गए
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
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