भूमिका Poetry

ज़मीन मेरी रहेगी न आइना मेरा

ग़ुलाम हुसैन साजिद

मकान ख़ाली है

अज़ीज़ क़ैसी

नफ़रतों की नई दीवार उठाते हुए लोग

एहतिमाम सादिक़

सियानी

मुबश्शिर अली ज़ैदी

बाज़-गश्त

अर्श सिद्दीक़ी

मैं बच गई माँ

ज़ेहरा निगाह

सियाह-रात पशेमाँ है हम-रकाबी से

अहमद फ़ाख़िर

क्यूँ यूरिश-ए-तरब में भी ग़म याद आ गए

एहतिशाम हुसैन

सुलग रहा है कोई शख़्स क्यूँ अबस मुझ में

अब्दुल्लाह कमाल

अब तक तो यही पता नहीं है

बिमल कृष्ण अश्क

टीपू-सुल्तान

इज्तिबा रिज़वी

ज़मीन सिमट कर मेरे तलवे से आ लगी

जवाज़ जाफ़री

आख़िरी आदमी

फ़ख़्र-ए-आलम नोमानी

तिश्नगी

अनीस अहमद अनीस

विसाल

बशर नवाज़

ज़िंदगी और मौत

फ़ज़लुर्रहमान

बात बह जाने की सुन कर अश्क बरहम हो गए

बाल बाल दुनिया पर उस का ही इजारा है

ज़ुल्फ़िकार नक़वी

ये शोर-ओ-शर तो पहले दिन से आदम-ज़ाद में है

ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश

हमारे शहर में आने की सूरत चाहती हैं

ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश

जाने हम ये किन गलियों में ख़ाक उड़ा कर आ जाते हैं

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

हमें यूँही न सर-ए-आब-ओ-गिल बनाया जाए

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

जितनी भी तेज़ हो सके रफ़्तार कर के देख

ज़ुहूर-उल-इस्लाम जावेद

रक्खा नहीं ग़ुर्बत ने किसी इक का भरम भी

ज़ुहूर नज़र

इश्क़ में मारके बला के रहे

ज़ुहूर नज़र

बादा-कश हूँ न पारसा हूँ मैं

ज़ुहैर कंजाही

चारों तरफ़ हैं ख़ार-ओ-ख़स दश्त में घर है बाग़ सा

ज़ुबैर शिफ़ाई

तमाम रास्ता फूलों भरा तुम्हारा था

ज़ुबैर रिज़वी

मिलन मौसमों की सज़ा चाहता हूँ

ज़ुबैर रिज़वी

नज़र नज़र से मिलाओगे मारे जाओगे

ज़ुबैर क़ैसर

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