भूमिका Poetry (page 29)

कुछ नक़्श तिरी याद के बाक़ी हैं अभी तक

अज़ीम मुर्तज़ा

ये और बात है कि मदावा-ए-ग़म न था

अज़ीम मुर्तज़ा

महरूमी के दुख और तन्हाई के रंज उठाए

अज़ीम मुर्तज़ा

कुछ नक़्श तिरी याद के बाक़ी हैं अभी तक

अज़ीम मुर्तज़ा

कुछ भी हो मिरा हाल नुमायाँ तो नहीं है

अज़ीम मुर्तज़ा

कभी नाकामियों का अपनी हम मातम नहीं करते

आज़ाद गुरदासपुरी

फेंका था हम पे जो कभी उस को उठा के देख

आज़ाद गुलाटी

मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है

आज़ाद गुलाटी

ये इक शान-ए-ख़ुदा है मैं नहीं हूँ

आज़ाद अंसारी

आज शब-ए-मेराज होगी इस लिए तज़ईन है

औरंगज़ेब

आइने से गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

आ कर उरूज कैसे गिरा है ज़वाल पर

औरंगज़ेब

गह मश्क़-ए-सितम गाह-ए-करम याद करेंगे

औलाद अली रिज़वी

किस के पैरों के नक़्श हैं मुझ में

अतीक़ुल्लाह

वो तवानाई कहाँ जो कल तलक आज़ा में थी

अतीक़ुल्लाह

वो जो सर्फ़-ए-निगाह करता है

अतीक़ुल्लाह

फ़रार के लिए जब रास्ता नहीं होगा

अतीक़ुल्लाह

दिल के नज़दीक तो साया भी नहीं है कोई

अतीक़ुल्लाह

धुएँ में डूबे हैं फूल तारे चराग़ जुगनू चिनार कैसे

अतहर सलीमी

तिरी आँखों में इक मुबहम फ़साना ढूँढ ही लेगा

अताउर्रहमान जमील

ख़िराज-अक़ीदत

असरार-उल-हक़ मजाज़

कैसे रफ़ू हों चाक-ए-गरेबाँ मैं भी सोचूँ तू भी सोच

असरारुल हक़ असरार

बरहनगी का मुदावा कोई लिबास न था

असरार ज़ैदी

आओ चलें उस खंडर में

असरा रिज़वी

ये आग मोहब्बत की बुझाए न बुझे है

असरा रिज़वी

सफ़र से पहले सराबों का सिलसिला रख आए

असलम महमूद

पत्थरों पर वादियों में नक़्श-ए-पा मेरा भी है

असलम महमूद

बुझ गए मंज़र उफ़ुक़ पर हर निशाँ मद्धम हुआ

असलम महमूद

सुबुक सा दर्द था उठता रहा जो ज़ख़्मों से

असलम हबीब

हम ने हर ख़्वाब को ताबीर अता की 'असलम'

असलम अंसारी

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