नज़र Poetry (page 20)

ख़ूबाँ जो पहनते हैं निपट तंग चोलियाँ

ताबाँ अब्दुल हई

देख उस को ख़्वाब में जब आँख खुल जाती है सुब्ह

ताबाँ अब्दुल हई

आई बहार शोरिश-तिफ़लाँ को क्या हुआ

ताबाँ अब्दुल हई

मैं बाग़ में हूँ तालिब-ए-दीदार किसी का

तअशशुक़ लखनवी

ता-सहर की है फ़ुग़ाँ जान के ग़ाफ़िल मुझ को

तअशशुक़ लखनवी

न डरे बर्क़ से दिल की है कड़ी मेरी आँख

तअशशुक़ लखनवी

जोश पर थीं सिफ़त-ए-अब्र-ए-बहारी आँखें

तअशशुक़ लखनवी

दिल जल के रह गए ज़क़न-ए-रश्क-ए-माह पर

तअशशुक़ लखनवी

दुखों की वादी में हर शाम का गुज़र ऐसे

सय्यदा ज़िया ख़ालिदा

क्या देखता है हाल के मंज़र इधर भी देख

सय्यदा शान-ए-मेराज

कभी कभी तिरी चाहत पे ये गुमाँ गुज़रा

सय्यदा शान-ए-मेराज

जो तिरी महफ़िल से ज़ौक़-ए-ख़ाम ले कर आए हैं

सय्यदा शान-ए-मेराज

हाल मौसम का ही पूछेगा वो जब पूछेगा

सय्यदा शान-ए-मेराज

शौक़ से लख़्त-ए-जिगर नूर-ए-नज़र पैदा करो

सय्यद ज़मीर जाफ़री

ज़िंदगी है मुख़्तलिफ़ जज़्बों की हमवारी का नाम

सय्यद ज़मीर जाफ़री

यूँ क़त्ल-ए-आम नौ-ए-बशर कर दिया गया

सय्यद ज़मीर जाफ़री

तजर्बात-ए-तल्ख़ ने हर-चंद समझाया मुझे

सय्यद ज़मीर जाफ़री

मेरी बीवी क़ब्र में लेटी है जिस हंगाम से

सय्यद ज़मीर जाफ़री

हुस्न को ग़ायत-ए-नज़र जाना

सय्यद ज़मीर जाफ़री

अपने ज़र्फ़ अपनी तलब अपनी नज़र की बात है

सय्यद ज़मीर जाफ़री

जब तिरा नाम सुना तो नज़र आया गोया

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

है दौर-ए-फ़लक ज़ोफ़ में पेश-ए-नज़र अपने

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

रोने की ये शिद्दत है कि घबरा गईं आँखें

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

मोहताज नहीं क़ाफ़िला आवाज़-ए-दरा का

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

मैं ने कहा कि दा'वा-ए-उलफ़त मगर ग़लत

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

जाँ-फ़िशानी का वाँ हिसाब अबस

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

हम उन की नज़र में समाने लगे

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

बर-सर-ए-लुत्फ़ आज चश्म-ए-दिल-रुबा थी मैं न था

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

अपना अपना रंग दिखलाती हैं जानी चूड़ियाँ

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

सब्र-ओ-तस्लीम की सिपर भी नहीं

सय्यद सिद्दीक़ हसन

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