नज़र Poetry (page 31)

सराबों का सफ़र

शमीम क़ासमी

राहगुज़र

शमीम करहानी

ज़बाँ को हुक्म ही कहाँ कि दास्तान-ए-ग़म कहें

शमीम करहानी

वो दिल भी जलाते हैं रख देते हैं मरहम भी

शमीम करहानी

उन का वादा बदल गया है

शमीम करहानी

समझे है मफ़्हूम नज़र का दिल का इशारा जाने है

शमीम करहानी

ख़मोश किस लिए बैठे हो चश्म-ए-तर क्यूँ हो

शमीम करहानी

जो मिल गई हैं निगाहें कभी निगाहों से

शमीम करहानी

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे

शमीम करहानी

ग़म दो आलम का जो मिलता है तो ग़म होता है

शमीम करहानी

दर्द-शनास दिल नहीं जल्वा-तलब नज़र नहीं

शमीम करहानी

बचाओ दामन-ए-दिल ऐसे हम-नशीनों से

शमीम करहानी

आ रही है शब-ए-ग़म मेरी तरफ़ मेरे लिए

शमीम करहानी

जब शिकायत थी कि तूफ़ाँ में सहारा न मिला

शमीम जयपुरी

इस इल्तिफ़ात पर कोई दामन न थाम ले

शमीम जयपुरी

हर शय तुझी को सामने लाए तो क्या करूँ

शमीम जयपुरी

दुनिया-ए-मोहब्बत में हम से हर अपना पराया छूट गया

शमीम जयपुरी

आज जीने की कुछ उम्मीद नज़र आई है

शमीम जयपुरी

तुम्हारे चाक पर ऐ कूज़ा-गर लगता है डर हम को

शमीम हनफ़ी

फिर लौट के इस बज़्म में आने के नहीं हैं

शमीम हनफ़ी

नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में

शमीम हनफ़ी

हर नक़्श-ए-नवा लौट के जाने के लिए था

शमीम हनफ़ी

अब क़ैस है कोई न कोई आबला-पा है

शमीम हनफ़ी

जो चेहरे के बाहर है वो अंदर न मिलेगा

शमीम अनवर

न संग-ए-राह न सद्द-ए-क़ुयूद की सूरत

शाम रिज़वी

ये किस का जल्वा-ए-हैरत-फ़ज़ा निगाह में है

शकूर जावेद

हर नफ़स दीदा-ए-दिल में तिरी यादों का हुजूम

शकूर जावेद

याद तुम आए तो फिर बन गईं बादल आँखें

शकील शम्सी

तेरी नज़र के सामने ये दिल नहीं रहा

शकील शम्सी

संग मजनूँ पे लड़कपन में उठाया क्यूँ था

शकील शम्सी

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