नज़र Poetry (page 30)

मैं किसी दूसरे पहलू से उसे क्यूँ सोचूँ

शारिक़ कैफ़ी

हो सबब कुछ भी मिरे आँख बचाने का मगर

शारिक़ कैफ़ी

बहुत हसीं रात है मगर तुम तो सो रहे हो

शारिक़ कैफ़ी

नज़र भर देख लूँ बस

शारिक़ कैफ़ी

जन्नत से दूर

शारिक़ कैफ़ी

ये चुपके चुपके न थमने वाली हँसी तो देखो

शारिक़ कैफ़ी

सामने तेरे हूँ घबराया हुआ

शारिक़ कैफ़ी

रात बे-पर्दा सी लगती है मुझे

शारिक़ कैफ़ी

पहली बार वो ख़त लिक्खा था

शारिक़ कैफ़ी

मुमकिन ही न थी ख़ुद से शनासाई यहाँ तक

शारिक़ कैफ़ी

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

शारिक़ कैफ़ी

गुज़र रहा है वो लम्हा तो याद आया है

शारिक़ कैफ़ी

बे-तकल्लुफ़ मिरा हैजान बनाता है मुझे

शारिक़ कैफ़ी

अजब शिकस्त का एहसास दिल पे छाया था

शारिक़ कैफ़ी

ख़्वाब ऐसा भी नज़र आया है अक्सर मुझ को

शारिक़ जमाल

न यही कि ज़ौक़-ए-नज़र मिरा सफ़-ए-गुल-रुख़ाँ से गुज़र गया

शारिक़ ईरायानी

क़ुदरत है तुर्फ़ा-कार तुझे कुछ ख़बर भी है

शारिक़ ईरायानी

तू समझता है तो ख़ुद तेरी नज़र गहरी नहीं

शरीफ़ कुंजाही

शैख़ कुछ अपने-आप को समझें

शरफ़ मुजद्दिदी

आलम-ए-इश्क़ में अल्लाह-रे नज़र की वुसअत

शरफ़ मुजद्दिदी

सब्ज़ सूरज की किरन

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

शोर-ए-तूफ़ान-ए-हवा है बे-अमाँ सुनते रहो

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

यूँ ब-ज़ाहिर देखे तो यार सब

शम्स तबरेज़ी

अपना घर भी कोई आसेब का घर लगता है

शम्स तबरेज़ी

ये अर्ज़-ओ-समा क़ुलज़ुम-ओ-सहरा मुतहर्रिक

शम्स रम्ज़ी

लफ़्ज़-ओ-मा'नी के समुंदर का सफ़र हैं कुछ लोग

शम्स रम्ज़ी

ग़म दिए हैं तो मसर्रत के गुहर भी देना

शम्स रम्ज़ी

मिरे ए'तिमाद को ग़म मिला मिरी जब किसी पे नज़र गई

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

मंज़िल-ए-इश्क़ के राहबर खो गए

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

तू याद आया और मिरी आँख भर गई

शमीम तारिक़

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