नज़र Poetry (page 55)

गुमाँ हद्द-ए-नज़र तक क्या था लेकिन क्या नज़र आया

रौनक़ नईम

नियाज़-आगीं है और नाज़-आफ़रीं भी

रौनक़ दकनी

नाश्ते पर जिसे आज़ाद किया है मैं ने

रउफ़ रज़ा

वो ख़ुश-सुख़न तो किसी पैरवी से ख़ुश न हुआ

रऊफ़ ख़ैर

ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई

रतन पंडोरवी

शौक़ से आए बुरा वक़्त अगर आता है

रसूल साक़ी

मिरी दिन के उजालों पर नज़र है

रसूल साक़ी

शेवा-ए-ज़ब्त को रुस्वा दिल-ए-नाशाद न कर

रसूल जहाँ बेगम मख़फ़ी बदायूनी

कुछ हद भी ऐ फ़लक सितम-ए-ना-रवा की है

रसूल जहाँ बेगम मख़फ़ी बदायूनी

किसी दराज़ में रखना कि ताक़ पर रखना

रासिख़ इरफ़ानी

खंडर में दफ़्न हुई हैं इमारतें क्या क्या

रासिख़ इरफ़ानी

शुऊर-ए-ज़ीस्त सही ए'तिबार करना भी

रशक खलीली

रौशनी बन के अँधेरे पे असर हम ने किया

राशिद तराज़

दर जो खोला है कभी उस से शनासाई का

राशिद नूर

वो जो ख़ुद अपने बदन को साएबाँ करता नहीं

राशिद मुफ़्ती

लाख मुझे दोश पे सर चाहिए

राशिद मुफ़्ती

कुछ यूँ भी मुझे रास हैं तन्हाइयाँ अपनी

राशिद मुफ़्ती

हाथ से छू कर ये नीला आसमाँ भी देखते

राशिद मुफ़्ती

दुनिया में है यूँ तो कौन बे-ग़म

राशिद मुफ़्ती

कोई साया न शजर याद आया

राशिद हामिदी

नदी को देख कर

राशिद अनवर राशिद

जंगल की लकड़ियाँ

राशिद अनवर राशिद

उड़ती रहती थी सदा ख़ित्ता-ए-वीरान में ख़ाक

राशिद अनवर राशिद

मुंजमिद आख़िर है क्यूँ ता-हद्द-ए-मंज़र फैल जा

राशिद अनवर राशिद

अब तो इक पल के लिए भी न गंवाएँगे तुम्हें

राशिद अनवर राशिद

तजज़िया

राशिद आज़र

वही तअल्लुक़-ए-ख़ातिर जो बर्क़-ओ-बाद में है

राशिद आज़र

मालूम है वो मुझ से ख़फ़ा है भी नहीं भी

राशिद आज़र

कम से कम अपना भरम तो नहीं खोया होता

राशिद आज़र

रुके हुए हैं जो दरिया उन्हें रवानी दे

रशीदुज़्ज़फ़र

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