नज़र Poetry (page 53)

आप अपनी नक़ाब है प्यारे

रियासत अली ताज

हर एक जिस्म पे बस एक ही से गहने लगे

रिन्द साग़री

यार आया है अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार दिखाओ

रिन्द लखनवी

तू आप को पोशीदा ओ इख़्फ़ा न समझना

रिन्द लखनवी

सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री

रिन्द लखनवी

मुँह न ढाँको अब तो सूरत देख ली

रिन्द लखनवी

लाला-रूयों से कब फ़राग़ रहा

रिन्द लखनवी

ना-आश्ना-ए-दर्द नहीं बेवफ़ा नहीं

रिफ़अत सुलतान

जो रिवायात भूल जाते हैं

रिफ़अत सुलतान

यूँही गर लुत्फ़ तुम लेते रहोगे ख़ूँ बहाने में

रिफ़अत सेठी

फिर तुम रुख़-ए-ज़ेबा से नक़ाब अपने उठा दो

रिफ़अत सेठी

लोग उट्ठे हैं तिरी बज़्म से क्या क्या हो कर

रिफ़अत सेठी

न कोई दोस्त न दुश्मन अजीब दुनिया है

रिफ़अत सरोश

घर को अब दश्त-ए-कर्बला लिक्खूँ

रिफ़अत सरोश

वक़्त ख़ुश-ख़ुश काटने का मशवरा देते हुए

रियाज़ मजीद

सत्‌ह-बीं थे सब, रहे बाहर की काई देखते

रियाज़ मजीद

ख़ुद में झाँका तो अजब मंज़र नज़र आया मुझे

रियाज़ मजीद

हो गया है एक इक पल काटना भारी मुझे

रियाज़ मजीद

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

रात आ बैठी है पहलू में सितारो तख़लिया

रहमान फ़ारिस

दिल को रह रह के ये अंदेशे डराने लग जाएँ

रेहाना रूही

उस का चेहरा भी सुनाता है कहानी उस की

रेहाना क़मर

तुम्हीं बताओ वो कौन है जो हर एक लम्हा सता रहा है

रज़िया हलीम जंग

था मिरी जस्त पे दरिया बड़ी हैरानी में

राज़ी अख्तर शौक़

मैं जब भी क़त्ल हो कर देखता हूँ

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे कटे क़सीदा-गो हर्फ़-गरों के दरमियाँ

राज़ी अख्तर शौक़

दस्तक सी ये क्या थी कोई साया है कि मैं हूँ

राज़ी अख्तर शौक़

छेड़ के साज़-ए-ज़रगरी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है रक़्स में

राज़ी अख्तर शौक़

रैलियाँ ही रैलियाँ

रज़ा नक़वी वाही

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