नज़र Poetry (page 52)

ये रात दिन का बदलना नज़र में रहता है

सादुल्लाह शाह

नाव काग़ज़ की सही कुछ तो नज़र से गुज़रे

सादुल्लाह कलीम

बनते ही शहर का ये देखिए वीराँ होना

एस ए मेहदी

ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है

रूही कंजाही

किसी भी काम का मेरा हुनर नहीं न सही

रूही कंजाही

किस लिए फिरता हूँ तन्हा न किसी ने पूछा

रूही कंजाही

हज़ार रंग जलाल-ओ-जमाल के देखे

रूही कंजाही

चैन घर में न कभी तेरे नगर में पाऊँ

रूही कंजाही

अब तो यूँ लब पे मिरे हर्फ़-ए-सदाक़त आए

रूही कंजाही

ये एहतियात इश्क़ पे लाज़िम सदा रहे

रोहित सोनी ‘ताबिश’

उसी हसीं से चमन में बहार आज भी है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

तिलिस्म-ए-नश्शा-ए-दुनिया भी आज ख़त्म हुआ

रोहित सोनी ‘ताबिश’

हवा-ए-जिंदगी भी कूचा-ए-क़ातिल से आती है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

था निगाहों में बसाया जाने किस तस्वीर को

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

मोहब्बत का सफ़र हे और मैं हूँ

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

कोई ख़्वाब था जो बिखर गया कोई दर्द था जो ठहर गया

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

हर एक ख़लिया को आईना घर बनाते हुए

रियाज़ लतीफ़

ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

वा'दा था जिस का हश्र में वो बात भी तो हो

रियाज़ ख़ैराबादी

तेज़ है पीने में हो जाएगी आसानी मुझे

रियाज़ ख़ैराबादी

रूठे हुए कि अपने ज़रा अब मनाए ज़ुल्फ़

रियाज़ ख़ैराबादी

मेरे पहलू में हमेशा रही सूरत अच्छी

रियाज़ ख़ैराबादी

ले गया घर से उन्हें ग़ैर के घर का ता'वीज़

रियाज़ ख़ैराबादी

ख़्वाब में भी नज़र आ जाए जो घर की सूरत

रियाज़ ख़ैराबादी

जिस दिन से हराम हो गई है

रियाज़ ख़ैराबादी

होगी वो दिल में जो ठानी जाएगी

रियाज़ ख़ैराबादी

दुनिया से अलग हम ने मयख़ाने का दर देखा

रियाज़ ख़ैराबादी

दर खुला सुब्ह को पौ फटते ही मय-ख़ाने का

रियाज़ ख़ैराबादी

आरज़ू भी तो कर नहीं आती

रियाज़ ख़ैराबादी

ये आलम-ए-वहशत है कि दहशत का असर है

रियासत अली ताज

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