नज़र Poetry (page 51)

काम इतनी ही फ़क़त राहगुज़र आएगी

साबिर ज़फ़र

जिधर हो ज़िंदगी मुश्किल उधर नहीं आते

साबिर ज़फ़र

डूबता हूँ जो हटाता हूँ नज़र पानी से

साबिर ज़फ़र

वो धूप वो गलियाँ वही उलझन नज़र आए

साबिर वसीम

असीर-ए-शाम हैं ढलते दिखाई देते हैं

साबिर वसीम

रुख़ उन का कहीं और नज़र और तरफ़ है

साबिर दत्त

हैरान हूँ दो आँखों से क्या देख रहा हूँ

साबिर दत्त

चाँदनी रात में शानों से ढलकती चादर

साबिर दत्त

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

बस अना को बहाल रखना है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

किस को बताते किस से छुपाते सुराग़-ए-दिल

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

जहाँ में जिस की शोहरत कू-ब-कू है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

क़लम से राब्ता-ए-रंग-ओ-आब टूट गया

सबा नक़वी

नग़्मा-ज़न है नज़र-ए-बे-आवाज़

सबा नक़वी

कहाँ पे बिछड़े थे हम लोग कुछ पता मिल जाए

सबा जायसी

ख़्वाहिशों ने दिल को तस्वीर-ए-तमन्ना कर दिया

सबा अकबराबादी

कौन उठाए इश्क़ के अंजाम की जानिब नज़र

सबा अकबराबादी

उजाला कर के ज़ुल्मत में घिरा हूँ

सबा अकबराबादी

मंज़िल पे पहुँचने का मुझे शौक़ हुआ तेज़

सबा अकबराबादी

कसरत-ए-जल्वा को आईना-ए-वहदत समझो

सबा अकबराबादी

जुनूँ में गुम हुए होश्यार हो कर

सबा अकबराबादी

जो हमारे सफ़र का क़िस्सा है

सबा अकबराबादी

है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ

सबा अकबराबादी

ग़ालिबन मेरे अलावा कोई गुज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

आईना बन जाइए जल्वा-असर हो जाइए

सबा अकबराबादी

होश-ओ-ख़िरद से दूर हूँ सूद-ओ-ज़ियाँ से दूर

सबा अफ़ग़ानी

ज़ोम न कीजो शम्अ-रू बज़्म के सोज़ ओ साज़ पर

साइल देहलवी

वफ़ा का बंदा हूँ उल्फ़त का पासदार हूँ मैं

साइल देहलवी

मिले ग़ैरों से मुझ को रंज ओ ग़म यूँ भी है और यूँ भी

साइल देहलवी

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर वाले

साइल देहलवी

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