नज़र Poetry (page 56)

सर-ब-सर शाख़-ए-दिल हरी रहेगी

राशिदा माहीन मलिक

लाख चाहा मैं ने पर्दा सामने आया नहीं

रशीद उस्मानी

जब नज़र उस ने मिलाई होगी

रशीद रामपुरी

अहल-ए-नज़र की आँख में हुस्न की आबरू नहीं

रशीद रामपुरी

माना वो एक ख़्वाब था धोका नज़र का था

रशीद क़ैसरानी

माना वो एक ख़्वाब था धोका नज़र का था

रशीद क़ैसरानी

अपनी तरह मुझे भी ज़माने में आम कर

रशीद क़ैसरानी

आया उफ़ुक़ की सेज तक आ कर पलट गया

रशीद क़ैसरानी

मैं उसे अपने मुक़ाबिल देख कर घबरा गया

रशीद निसार

सुर्ख़ हो जाता है मुँह मेरी नज़र के बोझ से

रशीद लखनवी

सिलसिला-जुम्बान-ए-वहशत में नई तदबीर से

रशीद लखनवी

ख़ार-ओ-ख़स फेंके चमन के रास्ते जारी करे

रशीद लखनवी

जोश-ए-वहशत मेरे तलवों को ये ईज़ा भी सही

रशीद लखनवी

हिज्र है अब था यहीं में ज़ार हम पहलू-ए-दोस्त

रशीद लखनवी

है अंधेरा तो समझता हूँ शब-ए-गेसू है

रशीद लखनवी

गर्दिश-ए-चश्म है पैमाने में

रशीद लखनवी

दम-ए-रफ़्तार-ए-जानाँ ये सदा-ए-नाज़ आती है

रशीद लखनवी

आँसू की तरह पोंछ के फेंका गया हूँ मैं

रशीद कौसर फ़ारूक़ी

शजर सूखा तो फ़ौरन कट गया है

रशीद जावेद

आने को नज़र में मिरी सौ फ़ित्ना-गर आए

रसा रामपुरी

उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास

रसा चुग़ताई

इस से पहले नज़र नहीं आया

रसा चुग़ताई

हम ने तो इस इश्क़ में यारो खींचे हैं आज़ार बहुत

रसा चुग़ताई

हर चीज़ से मावरा ख़ुदा है

रसा चुग़ताई

अपनी बे-चेहरगी में पत्थर था

रसा चुग़ताई

जनाज़ा धूम से उस आशिक़-ए-जाँ-बाज़ का निकले

रंजूर अज़ीमाबादी

मेरे ख़त का जवाब आया था

राणा गन्नौरी

जीत और हार का इम्कान कहाँ देखते हैं

राना आमिर लियाक़त

ज़ख़्म इस ज़ख़्म पे तहरीर किया जाएगा

रम्ज़ी असीम

इस सदी का जब कभी ख़त्म-ए-सफ़र देखेंगे लोग

रम्ज़ अज़ीमाबादी

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