नज़र Poetry (page 28)

जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं

दाग़ देहलवी

डरते हैं चश्म ओ ज़ुल्फ़ ओ निगाह ओ अदा से हम

दाग़ देहलवी

भला हो पीर-ए-मुग़ाँ का इधर निगाह मिले

दाग़ देहलवी

दोनों की आरज़ू में चमक बरक़रार है

चित्रांश खरे

मचलेंगे उन के आने पे जज़्बात सैंकड़ों

चरख़ चिन्योटी

गुम-शुदा आदमी का इंतिज़ार

चन्द्रभान ख़याल

दौर-ए-निगाह-ए-साक़ी-ए-मस्ताना एक है

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

रामायण का एक सीन

चकबस्त ब्रिज नारायण

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता

चकबस्त ब्रिज नारायण

अभी बादलों का सफ़र कहाँ मिरे मेहरबाँ

बुशरा हाश्मी

आँखों को अब निगाह की आदत नहीं रही

बुशरा हाश्मी

अल्लाह अल्लाह वस्ल की शब इस क़दर ए'जाज़ है

बूम मेरठी

बैठा नहीं हूँ साया-ए-दीवार देख कर

बिस्मिल सईदी

अब दम-ब-ख़ुद हैं नब्ज़ की रफ़्तार देख कर

बिस्मिल अज़ीमाबादी

ख़याल को ज़ौ नज़र को ताबिश नफ़स को रख़शंदगी मिलेगी

बिर्ज लाल रअना

पड़ने लगे जो ज़ोर हवस का तो क्या निगाह

बिमल कृष्ण अश्क

जब चौदहवीं का चाँद निकलता दिखाई दे

बिमल कृष्ण अश्क

बैठे जो शाम से तिरे दर पे सहर हुई

भारतेंदु हरिश्चंद्र

क्यूँ कह के दिल का हाल उसे बद-गुमाँ करूँ

बेख़ुद देहलवी

हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा

बेख़ुद देहलवी

ऐसा बना दिया तुझे क़ुदरत ख़ुदा की है

बेख़ुद देहलवी

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप

बेख़ुद देहलवी

आप हैं बे-गुनाह क्या कहना

बेख़ुद देहलवी

आह करना दिल-ए-हज़ीं न कहीं

बेखुद बदायुनी

तो पहले मेरा ही हाल-ए-तबाह लिख लीजे

बेकल उत्साही

रहीन-ए-आस रही है न महव-ए-यास रही

बेकल उत्साही

ख़ुद अपने जुर्म का मुजरिम को ए'तिराफ़ न था

बेकल उत्साही

हम भी ख़ुद को तबाह कर लेते

बहज़ाद लखनवी

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

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