रंग Poetry (page 73)

तू भी वफ़ा के रूप में अब ढल के देख ले

अज़हर जावेद

दिल की गली में चाँद निकलता रहता है

अज़हर इक़बाल

ये भी रहा है कूचा-ए-जानाँ में अपना रंग

अज़हर इनायती

ये क्या कि रंग हाथों से अपने छुड़ाएँ हम

अज़हर इनायती

कुछ आरज़ी उजाले बचाए हुए हैं लोग

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

हक़ीक़तों का नई रुत की है इरादा क्या

अज़हर इनायती

घर तो हमारा शो'लों के नर्ग़े में आ गया

अज़हर इनायती

अभी बिछड़ा है वो कुछ रोज़ तो याद आएगा

अज़हर इनायती

रात की आग़ोश से मानूस इतने हो गए

अज़हर फ़राग़

वो शब के साए में फ़स्ल-ए-नशात काटते हैं

अज़हर अदीब

दिल प्यासा और आँख सवाली रह जाती है

अज़हर अदीब

वो शोख़ दिल-ओ-जाँ की तमन्ना तो न निकला

अज़ीम कुरेशी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

रहगुज़ारों में रौशनी के लिए

अय्यूब रूमानी

उतरन पहनोगे

अय्यूब ख़ावर

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना

अय्यूब ख़ावर

सोचों में लहू उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

सात सुरों का बहता दरिया तेरे नाम

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

बर्ग-ए-गुल शाख़-ए-हिज्र का कर दे

अय्यूब ख़ावर

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया

अय्यूब ख़ावर

आइने से गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

न जिस का कोई सहारा हो वो किधर जाए

औलाद अली रिज़वी

ख़्वाहिशें दुनिया की बार-ए-दोश-ओ-गर्दन हो गईं

औज लखनवी

चार-सू आलम-ए-इम्काँ में अँधेरा देखा

औज लखनवी

चलो सुरंग से पहले गुज़र के देखा जाए

अतीक़ुल्लाह

एक वो ही शख़्स मुझ को अब गवारा भी नहीं

आतिफ़ ख़ान

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