रंग Poetry (page 71)
तहलील
बलराज कोमल
दीदा-ए-तर
बलराज कोमल
यकायक अक्स धुँदलाने लगे हैं
बकुल देव
हुए हम बे-सर-ओ-सामान लेकिन
बकुल देव
बारिशों में अब के याद आए बहुत
बकुल देव
अपना बिगड़ा हुआ बनाव लिए
बकुल देव
घर भी वीराना लगे ताज़ा हवाओं के बग़ैर
बख़्श लाइलपूरी
रुत न बदले तो भी अफ़्सुर्दा शजर लगता है
बख़्श लाइलपूरी
हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया
बख़्श लाइलपूरी
दीदा-ए-बे-रंग में ख़ूँ-रंग मंज़र रख दिए
बख़्श लाइलपूरी
कुफ़्र एक रंग-ए-क़ुदरत-ए-बे-इंतिहा में है
बहराम जी
हाथ क्यूँ बाँधे मिरे छल्ला अगर चोरी हुआ
ज़फ़र
वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले
ज़फ़र
शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही
ज़फ़र
सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद
ज़फ़र
नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा
ज़फ़र
देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है
ज़फ़र
दमक उठी है फ़ज़ा माहताब-ए-ख़्वाब के साथ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
लहू का आख़िरी क़तरा निचोड़ने पर भी
बद्र वास्ती
धानी सुरमई सब्ज़ गुलाबी जैसे माँ का आँचल शाम
बद्र वास्ती
जलती बुझती हुई आँखों में सितारे लिक्खे
अज़रा वहीद
फ़ज़ा का रंग निखरता दिखाई देता है
अज़रा वहीद
सिमट गई तो शबनम फूल सितारा थी
अज़रा परवीन
अब अपनी चीख़ भी क्या अपनी बे ज़बानी क्या
अज़रा परवीन
हार-सिंगार
अज़रा नक़वी
मेज़ पर रखे हाथ
अज़रा अब्बास
गरचे कुछ रंग उस का काला है
अज़मतुल्लाह ख़ाँ
शाम आई तो कोई ख़ुश-बदनी याद आई
अज़्म बहज़ाद
मैं ने चुप के अंधेरे में ख़ुद को रखा इक फ़ज़ा के लिए
अज़्म बहज़ाद
दिल सोया हुआ था मुद्दत से ये कैसी बशारत जागी है
अज़्म बहज़ाद
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