रंग Poetry (page 97)

किस हवाले से मुझे किस का पता याद आया

अदीम हाशमी

ग़म के हर इक रंग से मुझ को शनासा कर गया

अदीम हाशमी

वो लम्हा जो मेरा था

अदा जाफ़री

तुम जो सियाने हो गुन वाले हो

अदा जाफ़री

ये हुक्म है तिरी राहों में दूसरा न मिले

अदा जाफ़री

मुझे रंग-ए-ख़्वाब से ज़िंदगी का यक़ीं मिला

अदा जाफ़री

जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा

अदा जाफ़री

हर इक दरीचा किरन किरन है जहाँ से गुज़रे जिधर गए हैं

अदा जाफ़री

गुलों सी गुफ़्तुगू करें क़यामतों के दरमियाँ

अदा जाफ़री

गुलों को छू के शमीम-ए-दुआ नहीं आई

अदा जाफ़री

घर का रस्ता भी मिला था शायद

अदा जाफ़री

ढलके ढलके आँसू ढलके

अदा जाफ़री

आँखों में रूप सुब्ह की पहली किरन सा है

अदा जाफ़री

आगे हरीम-ए-ग़म से कोई रास्ता न था

अदा जाफ़री

कोई नालाँ कोई गिर्यां कोई बिस्मिल हो गया

अबुल कलाम आज़ाद

क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया

अबुल कलाम आज़ाद

ये इक और हम ने क़रीना किया

अबुल हसनात हक़्क़ी

ये इक और हम ने क़रीना किया

अबुल हसनात हक़्क़ी

तमाम हिज्र उसी का विसाल है उस का

अबुल हसनात हक़्क़ी

शब को हर रंग में सैलाब तुम्हारा देखें

अबुल हसनात हक़्क़ी

फूल का या संग का इज़हार कर

अबुल हसनात हक़्क़ी

दिल को हम दरिया कहें मंज़र-निगारी और क्या

अबुल हसनात हक़्क़ी

मालूम अब हुआ है आ हिन्द बीच हम कूँ

आबरू शाह मुबारक

कम मत गिनो ये बख़्त-सियाहों का रंग-ए-ज़र्द

आबरू शाह मुबारक

तुम्हारे लोग कहते हैं कमर है

आबरू शाह मुबारक

रखे कोई इस तरह के लालची को कब तलक बहला

आबरू शाह मुबारक

नहीं घर में फ़लक के दिल-कुशाई

आबरू शाह मुबारक

क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीर अटपटा है

आबरू शाह मुबारक

कोयल नीं आ के कोक सुनाई बसंत रुत

आबरू शाह मुबारक

कनहय्या की तरह प्यारे तिरी अँखियाँ ये साँवरियाँ

आबरू शाह मुबारक

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