सबसे Poetry (page 56)

अस्बाब यही है यही सामान हमारा

इक़बाल पयाम

रात भर कोई न दरवाज़ा खुला

इक़बाल नवेद

जब वो लब-ए-नाज़ुक से कुछ इरशाद करेंगे

इक़बाल मतीन

रवाँ हूँ मैं

इक़बाल कौसर

मुज़ाहिमतों के अहद-निगार

इक़बाल कौसर

जिस तरह लोग ख़सारे में बहुत सोचते हैं

इक़बाल कौसर

कैफ़-ए-हयात तेरे सिवा कुछ नहीं रहा

इक़बाल कैफ़ी

निगाहों से मेरी निगाहें बचाए

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

दिल-ए-मुज़्तर को हम कुछ इस तरह समझाए जाते हैं

इक़बाल हुसैन रिज़वी इक़बाल

मर्ग-ए-गुल से पेशतर

इक़बाल हैदर

जो तेरे दर्द हैं वही सब मेरे दर्द हैं

इक़बाल हैदर

ये ख़ौफ़ कम है मुझे और चमको जब तक हो

इक़बाल अशहर कुरेशी

सब तमन्नाओं से ख़्वाबों से निकल आए हैं

इक़बाल अशहर कुरेशी

ज़रा सी बात से मंज़र बदल भी सकता था

इक़बाल अंजुम

कहीं शबनम कहीं ख़ुशबू कहीं ताज़ा कली रखना

इन्तिज़ार ग़ाज़ीपुरी

कौन सा ग़म है मिरे दिल में जो मेहमान नहीं

इन्तेसार हुसैन आबिदी शाहिद

लैला ओ मजनूँ की लाखों गरचे तस्वीरें खिंचीं

इंशा अल्लाह ख़ान

ख़ूबान-ए-रोज़गार मुक़ल्लिद तेरी हैं सब

इंशा अल्लाह ख़ान

कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं

इंशा अल्लाह ख़ान

वो जो शख़्स अपने ही ताड़ में सो छुपा है दिल ही की आड़ में

इंशा अल्लाह ख़ान

वो देखा ख़्वाब क़ासिर जिस से है अपनी ज़बाँ और हम

इंशा अल्लाह ख़ान

साहब के हर्ज़ा-पन से हर एक को गिला है

इंशा अल्लाह ख़ान

सद-बर्ग गह दिखाई है गह अर्ग़वाँ बसंत

इंशा अल्लाह ख़ान

नींद मस्तों को कहाँ और किधर का तकिया

इंशा अल्लाह ख़ान

मिल गए पर हिजाब बाक़ी है

इंशा अल्लाह ख़ान

लो फ़क़ीरों की दुआ हर तरह आबाद रहो

इंशा अल्लाह ख़ान

किनाया और ढब का इस मिरी मज्लिस में कम कीजे

इंशा अल्लाह ख़ान

काश अब्र करे चादर-ए-महताब की चोरी

इंशा अल्लाह ख़ान

कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं

इंशा अल्लाह ख़ान

जो बात तुझ से चाही है अपना मिज़ाज आज

इंशा अल्लाह ख़ान

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