सबसे Poetry (page 87)

ज़ब्त-ए-ग़म कर भी लिया तो क्या किया

बासित भोपाली

जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है

बासित भोपाली

क़रार पाते हैं आख़िर हम अपनी अपनी जगह

बासिर सुल्तान काज़मी

होते हैं जो सब के वो किसी के नहीं होते

बासिर सुल्तान काज़मी

दूर साया सा है क्या फूलों में

बासिर सुल्तान काज़मी

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

जब मिलेंगे कि अब मिलेंगे आप

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

किस मस्ती में अब रहता हूँ

बशीर महताब

शहर-ए-फ़स्ल-ए-गुल से चल कर पत्थरों के दरमियाँ

बशीर फ़ारूक़ी

मिरे बदन में छुपी आग को हवा देगा

बशीर फ़ारूक़ी

सबा गुल-ए-रेज़ जाँ-परवर फ़ज़ा है

बशीर फ़ारूक़

प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ

बशीर बद्र

दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे

बशीर बद्र

बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे

बशीर बद्र

शो'ला-ए-गुल गुलाब शो'ला क्या

बशीर बद्र

सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में

बशीर बद्र

नज़र से गुफ़्तुगू ख़ामोश लब तुम्हारी तरह

बशीर बद्र

न जी भर के देखा न कुछ बात की

बशीर बद्र

मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है

बशीर बद्र

मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा

बशीर बद्र

ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में

बशीर बद्र

चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली

बशीर बद्र

अज़्मतें सब तिरी ख़ुदाई की

बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

बशीर बद्र

दम-ब-ख़ुद है चाँदनी चुप-चाप हैं अश्जार भी

बशीर मुंज़िर

अच्छे कभी बुरे हैं हालात आदमी के

बशीर मुंज़िर

तो ऐसा क्यूँ नहीं करते

बशर नवाज़

मुझे कहना है

बशर नवाज़

मुझे जीना नहीं आता

बशर नवाज़

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