सबा Poetry (page 7)

उम्र भर डोलती यादों की ज़िया से खेले

शफ़क़त बटालवी

चमन की ख़ाक पे मौज-ए-बला ने रक़्स किया

शफ़क़ सुपुरी

मज़ा शबाब का जब है कि बा-ख़ुदा भी रहे

शायर फतहपुरी

टूटे जो दाँत मुँह की शबाहत बिगड़ गई

शाद लखनवी

हर शब ख़याल-ए-ग़ैर के मारे अलग-थलग

शाद लखनवी

दुनिया में क़स्र-ओ-ऐवाँ बे-फ़ाएदा बनाया

शाद लखनवी

तमाम उम्र नमक-ख़्वार थे ज़मीं के हम

शाद अज़ीमाबादी

क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक

शाद अज़ीमाबादी

ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम

शाद अज़ीमाबादी

अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा

शाद अज़ीमाबादी

जेहल को इल्म का मेआ'र समझ लेते हैं

शायर लखनवी

फ़िराक़-मौसम के आसमाँ में उजाड़ तारे जुड़े हुए हैं

सीमाब ज़फ़र

नसीम है तिरे कूचे में और सबा भी है

मोहम्मद रफ़ी सौदा

कहियो सबा सलाम हमारा बहार से

मोहम्मद रफ़ी सौदा

नसीम है तिरे कूचे में और सबा भी है

मोहम्मद रफ़ी सौदा

दिलदार उस को ख़्वाह दिल-आज़ार कुछ कहो

मोहम्मद रफ़ी सौदा

दामन सबा न छू सके जिस शह-सवार का

मोहम्मद रफ़ी सौदा

गुज़र चली है शब-ए-दिल-फ़िगार आख़िरी बार

सऊद उस्मानी

सहर को साथ उड़ा ले गई सबा जैसे

सत्तार सय्यद

ज़िंदगी के कटहरे में इक बे-ख़ता आदमी की तरह

सत्तार सय्यद

शिकोह-ए-आब में गुम थे जिहत-निशाँ मेरे

सत्तार सय्यद

वक़्त के हाथों हिकायात-ए-अना भूल गए

सरवर आलम राज़

तसव्वुरात की दुनिया सजाए बैठे हैं

सरदार सोज़

दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है

सरदार सोज़

ब-जुज़ साया तन-ए-लाग़र को मेरे कोई क्या समझे

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

हँस दे तो खिले कलियाँ गुलशन में बहार आए

सलीम रज़ा रीवा

मिलना न मिलना एक बहाना है और बस

सलीम कौसर

फूलों की है तख़्लीक़ कि शो'लों से बना है

सलीम बेताब

चेहरे पे उस के अश्क की तहरीर बन गई

सलीम बेताब

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

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