सबा Poetry (page 6)

हम जो दस्तक कभी देते थे सबा की मानिंद

शहज़ाद अहमद

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया

शहज़ाद अहमद

न सही कुछ मगर इतना तो किया करते थे

शहज़ाद अहमद

तितलियाँ फूल में क्या ढूँढती रहती हैं सदा

शहनवाज़ ज़ैदी

रौशन आईनों में झूटे अक्स उतार गया

शहनवाज़ ज़ैदी

हर किसी ख़्वाब के चेहरे पे लिखूँ नाम तिरा

शहनवाज़ ज़ैदी

रोज़ खुलने की अदा भी तो नहीं आती है

शाहिद लतीफ़

सोचता है किस लिए तू मेरे यार दे मुझे

शाहिद कमाल

कूज़ा-ए-दर्द में ख़ुशियों के समुंदर रख दे

शाहिद कमाल

इब्तिदा से मैं इंतिहा का हूँ

शाहिद कमाल

भर गए ज़ख़्म तो क्या दर्द तो अब भी कोई है

शाहिद कमाल

अब्र लिखती है कहीं और घटा लिखती है

शाहिद कमाल

शहर-ए-निगाराँ में फिरते हैं हम आवारा रात ढले

शाहिद इश्क़ी

लुत्फ़ से तेरे सिवा दर्द महक जाता है

शाहिद इश्क़ी

लब तक जो न आया था वही हर्फ़-ए-रसा था

शाहिद इश्क़ी

कुछ अपनी बात कहो कुछ मिरी सुनो मत सो

शाहिद इश्क़ी

हर मर्ग-ए-आरज़ू का निशाँ देर तक रहा

शाहिद इश्क़ी

महका है गुल-ए-ख़ून-ए-वफ़ा जानिए क्या हो

शाहिद अख़्तर

अगर ये रौशनी क़ल्ब ओ नज़र से आई है

शाहीन मुफ़्ती

गर्म-जोशी के नगर में सर्द-तन्हाई मिली

शाहीन बद्र

याद उस की है कुछ ऐसी कि बिसरती भी नहीं

शहाब जाफ़री

दश्त-ए-ग़ुर्बत है तो वो क्यूँ हैं ख़फ़ा हम से बहुत

शहाब जाफ़री

उठती घटा है किस तरह बोले वो ज़ुल्फ़ उठा कि यूँ

शाह नसीर

सरज़मीन-ए-ज़ुल्फ़ में क्या दिल ठिकाने लग गया

शाह नसीर

निकहत-ए-गुल हैं या सबा हैं हम

शाह नसीर

कर के आज़ाद हर इक शहपर-ए-बुलबुल कतरा

शाह नसीर

कभू न उस रुख़-ए-रौशन पे छाइयाँ देखीं

शाह नसीर

छोड़ा न तुझे ने राम क्या ये भी न हुआ वो भी न हुआ

शाह नसीर

चश्म में कब अश्क भर लाते हैं हम

शाह नसीर

थी लगन सुनते तिरी शोख़ी-ए-पा की आहट

शाग़िल क़ादरी

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