सदा Poetry (page 11)

सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख कर

शहज़ाद अहमद

मैं अकेला हूँ यहाँ मेरे सिवा कोई नहीं

शहज़ाद अहमद

जाने किस सम्त से हवा आई

शहज़ाद अहमद

इस दोशीज़ा मिट्टी पर नक़्श-ए-कफ़-ए-पा कोई भी नहीं

शहज़ाद अहमद

हाल उस का तिरे चेहरे पे लिखा लगता है

शहज़ाद अहमद

फ़स्ल-ए-गुल ख़ाक हुई जब तो सदा दी तू ने

शहज़ाद अहमद

दिल से ये कह रहा हूँ ज़रा और देख ले

शहज़ाद अहमद

देखने उस को कोई मेरे सिवा क्यूँ आए

शहज़ाद अहमद

आती है दम-ब-दम ये सदा जागते रहो

शहज़ाद अहमद

नया उफ़क़

शहरयार

एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक

शहरयार

हँस रहा था मैं बहुत गो वक़्त वो रोने का था

शहरयार

आँख की ये एक हसरत थी कि बस पूरी हुई

शहरयार

इश्क़ को अपने लिए समझा असासा दिल का

शहनाज़ मुज़म्मिल

ग़म मुझ से किसी तौर समेटा नहीं जाता

शहनाज़ मुज़म्मिल

यूँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है

शाहिद ज़की

ग़म की तहज़ीब अज़िय्यत का क़रीना सीखें

शाहिद माहुली

ग़म की तहज़ीब अज़िय्यत का क़रीना सीखें

शाहिद माहुली

बू-ए-पैराहन-ए-सदा आए

शाहिद माहुली

ये जो रब्त रू-ब-ज़वाल है ये सवाल है

शाहिद लतीफ़

जो मिरी पुश्त में पैवस्त है उस तीर को देख

शाहिद कमाल

जो इस ज़मीन पे रहते थे आसमान से लोग

शाहिद कमाल

पुकारती है जो तुझ को तिरी सदा ही न हो

शाहिद कबीर

क्या फ़र्ज़ है ये जिस्म के ज़िंदाँ में सज़ा दे

शाहिद कबीर

नुक़ूश-ए-रहगुज़र-ए-शौक़ सब मिटा देना

शाहिद इश्क़ी

तेरे सिवा

शाहिद अख़्तर

जारी थी अभी दुआ हमारी

शाहीन अब्बास

दर-ए-इम्काँ से गुज़र कर सर-ए-मंज़र आ कर

शाहीन अब्बास

किसी आसेब-ज़दा दिल की सदा है क्या है

शाहबाज़ रिज़्वी

गरमी-ए-पहलू-ए-दिलदार ने सोने न दिया

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

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