रेगिस्तान Poetry (page 29)
बहुत सी आँखें लगीं हैं और एक ख़्वाब तय्यार हो रहा है
फ़रहत एहसास
शिकस्त-ए-आसमाँ हो जाऊँगा मैं
फ़रहान सालिम
मिरे चराग़ो मिरा गंज-ए-बे-कराँ ले लो
फ़रहान सालिम
बगूला बन के उड़ा ख़्वाहिशों के सहरा में
फ़रीद परबती
किसी पे करना नहीं ए'तिबार मेरी तरह
फ़रीद परबती
मोहब्बत का दिया ऐसे बुझा था
फ़रह इक़बाल
मैं एक बूँद समुंदर हुआ तो कैसे हुआ
फ़राग़ रोहवी
कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है
फ़राग़ रोहवी
कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है
फ़राग़ रोहवी
जो भी अंजाम हो आग़ाज़ किए देते हैं
फ़राग़ रोहवी
जिस दिन से कोई ख़्वाहिश-ए-दुनिया नहीं रखता
फ़राग़ रोहवी
जिस्म में गूँजता है रूह पे लिक्खा दुख है
फ़क़ीह हैदर
नहीं मंज़ूर तप-ए-हिज्र का रुस्वा होना
फ़ानी बदायुनी
ले ए'तिबार-ए-वादा-ए-फ़र्दा नहीं रहा
फ़ानी बदायुनी
क्यूँ न नैरंग-ए-जुनूँ पर कोई क़ुर्बां हो जाए
फ़ानी बदायुनी
ख़ुद मसीहा ख़ुद ही क़ातिल हैं तो वो भी क्या करें
फ़ानी बदायुनी
हर तबस्सुम को चमन में गिर्या-सामाँ देख कर
फ़ानी बदायुनी
दिल की काया ग़म ने वो पल्टी कि तुझ सा बन गया
फ़ानी बदायुनी
साक़िया तू ने मिरे ज़र्फ़ को समझा क्या है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
इसी जहाज़ के सहरा में डूब जाने की
फ़ैज़ान हाशमी
लोग कहते हैं कि क़ातिल को मसीहा कहिए
फ़ैज़ुल हसन
हम ने सहरा को सजाया था गुलिस्ताँ की तरह
फ़ैज़ुल हसन
जरस-ए-गुल की सदा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हज़र करो मिरे तन से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ब-नोक-ए-शमशीर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं
फ़हमी बदायूनी
ज़मीं ख़्वाब ख़ुश्बू
फ़हीम शनास काज़मी
हमारे शजरे बिखर गए हैं
फ़हीम शनास काज़मी
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