रेगिस्तान Poetry (page 44)

ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते

अहमद फ़राज़

अब सोचिए तो दाम-ए-तमन्ना में आ गए

अहमद अज़ीम

नज़्म

अहमद आज़ाद

वो नज़र मेहरबाँ अगर होती

आग़ाज़ बरनी

बुतों के वास्ते तो दीन-ओ-ईमाँ बेच डाले हैं

आग़ा शाएर क़ज़लबाश

परी-पैकर जो मुझ वहशी का पैराहन बनाते हैं

आग़ा हज्जू शरफ़

मौसम-ए-गुल में जो घिर घिर के घटाएँ आईं

आग़ा हज्जू शरफ़

ख़ुदा-मालूम किस की चाँद से तस्वीर मिट्टी की

आग़ा हज्जू शरफ़

हम हैं ऐ यार चढ़ाए हुए पैमाना-ए-इश्क़

आग़ा हज्जू शरफ़

फ़स्ल-ए-गुल में है इरादा सू-ए-सहरा अपना

आग़ा हज्जू शरफ़

आलम में हरे होंगे अश्जार जो मैं रोया

आग़ा हज्जू शरफ़

वक़्त के तूफ़ानी सागर में क्रोध कपट के रेले हैं

अफ़ज़ल परवेज़

मुझे बतलाईए अब कौन सी जीने की सूरत है

अफ़ज़ल मिनहास

उस लम्हे तिश्ना-लब रेत भी पानी होती है

अफ़ज़ल ख़ान

मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी

अफ़ज़ल ख़ान

तुम्हें ही सहरा सँभालने की पड़ी हुई है

अफ़ज़ल गौहर राव

किस प्यास से ख़ाली हुआ मश्कीज़ा हमारा

अफ़ज़ल गौहर राव

इसी लिए भी नए सफ़र से बंधे हुए हैं

अफ़ज़ल गौहर राव

चुप-चाप निकल आए थे सहरा की तरफ़ हम

अफ़ज़ल गौहर राव

सुलगती रेत पे तहरीर जो कहानी है

अफ़ज़ल इलाहाबादी

वापसी

आफ़ताब शम्सी

तिरे बदन के गुलिस्ताँ की याद आती है

आफ़ताब हुसैन

ये जब्र भी है बहुत इख़्तियार करते हुए

आफ़ताब हुसैन

मौज-दर-मौज हवाओं से बचा लाऊँगा

अफ़रोज़ आलम

शौक़-ए-वारफ़्ता चला शहर-ए-तमाशा की तरफ़

अफ़ीफ़ सिराज

मुझ को इक अर्सा-ए-दिल-गीर में रक्खा गया था

अफ़ीफ़ सिराज

वो मर गई थी

आदिल मंसूरी

पत्थर पर तस्वीर बना कर

आदिल मंसूरी

नज़्म

आदिल मंसूरी

हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद

आदिल मंसूरी

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