रात Poetry (page 20)

वक़्त आफ़ाक़ के जंगल का जवाँ चीता है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है

ज़ौक़

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

ज़ौक़

उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है

ज़ौक़

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा

ज़ौक़

न खींचो आशिक़-तिश्ना-जिगर के तीर पहलू से

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

क्या आए तुम जो आए घड़ी दो घड़ी के बाद

ज़ौक़

जो कुछ कि है दुनिया में वो इंसाँ के लिए है

ज़ौक़

बज़्म में ज़िक्र मिरा लब पे वो लाए तो सही

ज़ौक़

बाग़-ए-आलम में जहाँ नख़्ल-ए-हिना लगता है

ज़ौक़

ज़हर-ए-शब वीरान बिस्तर ऐ ख़ुदा

शहपर रसूल

दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया

शहपर रसूल

यार को महरूम-ए-तमाशा किया

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

था ग़ैर का जो रंज-ए-जुदाई तमाम शब

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

मैं वस्ल में भी 'शेफ़्ता' हसरत-तलब रहा

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

कहूँ मैं क्या कि क्या दर्द-ए-निहाँ है

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

गोर में याद-ए-क़द-ए-यार ने सोने न दिया

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दस्त-ए-अदू से शब जो वो साग़र लिया किए

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

मंज़र को किसी तरह बदलने की दुआ दे

शीन काफ़ निज़ाम

क्या ख़बर थी आतिशीं आब-ओ-हवा हो जाऊँगा

शीन काफ़ निज़ाम

इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को

शीन काफ़ निज़ाम

अक्स ने आईने का घर छोड़ा

शीन काफ़ निज़ाम

ज़मीं का क़र्ज़

शाज़ तमकनत

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म

शाज़ तमकनत

छटा आदमी

शाज़ तमकनत

वो नियाज़-ओ-नाज़ के मरहले निगह-ओ-सुख़न से चले गए

शाज़ तमकनत

शिकन शिकन तिरी यादें हैं मेरे बिस्तर की

शाज़ तमकनत

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