रात Poetry (page 21)

शब-ए-वा'दा कह गई है शब-ए-ग़म दराज़ रखना

शाज़ तमकनत

साँसों में बसे हो तुम आँखों में छुपा लूँगा

शाज़ तमकनत

किस किस को अब रोना होगा जाने क्या क्या भूल गया

शाज़ तमकनत

कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह

शाज़ तमकनत

जाने क्या क़ीमत-ए-अरबाब-ए-वफ़ा ठहरेगी

शाज़ तमकनत

हयात रास न आए अजल बहाना करे

शाज़ तमकनत

दिल-शिकस्ता हुए टूटा हुआ पैमान बने

शाज़ तमकनत

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

तेरी सी भी आफ़त कोई ऐ सोज़िश-ए-तब है

शौक़ क़िदवाई

शब-हाए-ऐश का वो ज़माना किधर गया

शौक़ देहलवी मक्की

ग़म की अँधेरी राहों में तो तुम भी नहीं काम आओ हो

शौकत परदेसी

एक आसेब का साया था जो सर से उतरा

शौकत काज़मी

दस्त-ए-ज़रूरियात में बटता चला गया

शौकत फ़हमी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

शिद्दत-ए-दर्द-ए-जिगर हो ये ज़रूरी तो नहीं

शातिर हकीमी

सब आसान हुआ जाता है

शारिक़ कैफ़ी

जो अपने सर पे सर-ए-शाख़-ए-आशियाँ गुज़री

शरीफ़ कुंजाही

अब किसी शाख़ पे हिलता नहीं पत्ता कोई

शरीफ़ कुंजाही

पर्दा-ए-रुख़ क्या उठा हर-सू उजाले हो गए

शारिब मौरान्वी

मिले हैं दर्द ही मुझ को मोहब्बतों के एवज़

शारिब मौरान्वी

कुछ भी हो उस से जुदाई का सबब घर जाओ

शरीफ़ अहमद शरीफ़

तीन शामों की एक शाम

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

शीशा-ए-साअत का ग़ुबार

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

रात शहर और उस के बच्चे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

अँधेरी शब से एक ला-हासिल

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

सुर्ख़ सीधा सख़्त नीला दूर ऊँचा आसमाँ

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

शोर-ए-तूफ़ान-ए-हवा है बे-अमाँ सुनते रहो

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

मौसम-ए-संग-ओ-रंग से रब्त-ए-शरार किस को था

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

किसी की चाह में दिल को जलाना ठीक है क्या

शम्स तबरेज़ी

ग़म दिए हैं तो मसर्रत के गुहर भी देना

शम्स रम्ज़ी

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