रात Poetry (page 36)

गाँधी

साहिर होशियारपुरी

शाम को सुब्ह अँधेरे को उजाला लिक्खें

साहिर होशियारपुरी

गोया ज़बान हाल थी 'साहिर' ख़मोश था

साहिर देहल्वी

नौ-ब-नौ एक उमडता हुआ तूफ़ान था मैं

साहिल अहमद

हवा ने सीने में ख़ंजर छुपा के रक्खा है

साहिबा शहरयार

शब-ए-सुरूर नई दास्ताँ विसाल-ओ-फ़िराक़

सहबा वहीद

साँप सपेरा और मैं

सहबा अख़्तर

हर रात का ख़्वाब

सहबा अख़्तर

इस बे तुलूअ' शब में क्या तालेअ'-आज़माई

सहबा अख़्तर

फ़र्द-ए-इसयाँ को वो सियाही दे

सहबा अख़्तर

आ जा अँधेरी रातें तन्हा बिता चुका हूँ

सहबा अख़्तर

तारीकियों का हिसाब

सहर अंसारी

नूह के बा'द

सहर अंसारी

हिसाब-ए-शब

सहर अंसारी

कहीं वो चेहरा-ए-ज़ेबा नज़र नहीं आया

सहर अंसारी

हवस ओ वफ़ा की सियासतों में भी कामयाब नहीं रहा

सहर अंसारी

साक़ी की इक निगाह के अफ़्साने बन गए

साग़र सिद्दीक़ी

चाँदनी शब है सितारों की रिदाएँ सी लो

साग़र सिद्दीक़ी

तख़्लीक़ अँधेरों से किए हम ने उजाले

साग़र निज़ामी

सदियों की शब-ए-ग़म को सहर हम ने बनाया

साग़र निज़ामी

हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे

साग़र निज़ामी

उस्ताद मर गए

साग़र ख़य्यामी

इक्कीसवीं सदी का आदमी

साग़र ख़य्यामी

दुम

साग़र ख़य्यामी

क्रिकेट मैच

साग़र ख़य्यामी

तौबा तौबा से नदामत की घड़ी आई है

साग़र ख़य्यामी

कितना पुर-सोज़ है ये नाला-ए-शब-गीर मिरा

साग़र ख़य्यामी

बैठे हैं ऐसे ज़ुल्फ़ में कलियाँ सँवार के

साग़र ख़य्यामी

अब जश्न-ए-अश्क ऐ शब-ए-हिज्राँ करेंगे हम

साग़र ख़य्यामी

जाना जाना जल्दी क्या है इन बातों को जाने दो

सफ़ी लखनवी

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