रात Poetry (page 34)

वस्ल ओ फ़स्ल की हर मंज़िल में शामिल इक मजबूरी थी

सलीम अहमद

उम्र भर काविश-ए-इज़हार ने सोने न दिया

सलीम अहमद

न जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

सलीम अहमद

मुझ को दुश्वार हुआ जिस का नज़ारा तन्हा

सलीम अहमद

मिला जो काम ग़म-ए-मो'तबर बनाने का

सलीम अहमद

किन नक़ाबों में है मस्तूर वो हुस्न-ए-मा'सूम

सलीम अहमद

ख़ुद अपनी लौ में था मेहराब-ए-जाँ में जलता था

सलीम अहमद

जाने किसी ने क्या कहा तेज़ हवा के शोर में

सलीम अहमद

इस आँख में ख़्वाब-ए-नाज़ हो जा

सलीम अहमद

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

बन के दुनिया का तमाशा मो'तबर हो जाएँगे

सलीम अहमद

थोड़ी देर ऐ साक़ी बज़्म में उजाला है

सलाम मछली शहरी

काश तुम समझ सकतीं ज़िंदगी में शाएर की ऐसे दिन भी आते हैं

सलाम मछली शहरी

ज़ुल्फ़-ए-शब-रंग जो बनाई है

सख़ी लख़नवी

रुख़-ए-रौशन दिखाइए साहब

सख़ी लख़नवी

निस्बत वही माह-ए-आसमाँ से

सख़ी लख़नवी

माह-ए-नौ पर्दा-ए-सहाब में है

सख़ी लख़नवी

दिल ही मेरा फ़क़त है मतलब का

सख़ी लख़नवी

दुआओं में असर बाक़ी न आहों में असर बाक़ी

सज्जाद शम्सी

सुब्ह

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तुझे मैं मिलूँ तो कहाँ मिलूँ मिरा तुझ से रब्त मुहाल है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

शो'ला सा कोई बर्क़-ए-नज़र से नहीं उठता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मिरे सफ़र की हदें ख़त्म अब कहाँ होंगी

सज्जाद बाक़र रिज़वी

कार-ए-वहशत में भी मजबूर है इंसाँ अब तक

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हो दिल-लगी में भी दिल की लगी तो अच्छा है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हासिल-ए-ज़ीस्त इश्क़ ही तो नहीं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

फ़रेब था अक़्ल-ओ-आगही का कि मेरी फ़िक्र-ओ-नज़र का धोका

सज्जाद बाक़र रिज़वी

'बाक़र' निशाना-ए-ग़म-ओ-रंज-ओ-अलम तो हो

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अँधेरे दिन की सफ़ारत को आए हैं अब के

सज्जाद बाक़र रिज़वी

लफ़्ज़ का कितना तक़द्दुस है ये कब जानते हैं

सज्जाद बाबर

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