रात Poetry (page 37)

तराना-ए-क़ौमी

सफ़ीर काकोरवी

ग़ुरूब होते हुए दो सितारे आँखों में

सफ़दर सिद्दीक़ रज़ी

शहर के लोग जिसे तेरी सितम-ज़ाई कहें

सफ़दर सलीम सियाल

मोहब्बतों में भी माल-ओ-मनाल माँगते हैं

सफ़दर सलीम सियाल

अपनी साँसें मिरी साँसों में मिला के रोना

सफ़दर सलीम सियाल

अपने अहद-ए-वफ़ा से रु-गर्दानी करता रहता है

सफ़दर सलीम सियाल

बहार आई है फिर पैरहन गुलाबी हो

सफ़दर मीर

चार सू हसरतों की पहनाई

सफ़दर ख़ुर्शीद

कोई पास आया सवेरे सवेरे

सईद राही

अपनी तलाश में निकले

सईद नक़वी

शिकस्त मान के तस्ख़ीर कर लिया है मुझे

सईद ख़ान

वो जिस का रंग सलोना है बादलों की तरह

सादिक़ नसीम

शिकस्त-ए-आबला-ए-दिल में नग़्मगी है बहुत

सादिक़ नसीम

उन्हें कह दो

सादिक़

एक पुरानी नज़्म

सादिक़

नींद आई ही नहीं हम को न पूछो कब से

सदा अम्बालवी

सुब्ह की सैर की करता हूँ तमन्ना शब भर

साबिर ज़फ़र

गुज़ारता हूँ जो शब इश्क़-ए-बे-मआश के साथ

साबिर ज़फ़र

यहाँ जो पेड़ थे अपनी जड़ों को छोड़ चुके

साबिर ज़फ़र

लहू में नाचती हमेश्गी उदास हो के रह गई

साबिर ज़फ़र

ख़ुमार-ए-शब में जो इक दूसरे पे गिरते हैं

साबिर ज़फ़र

दिन को मिस्मार हुए रात को तामीर हुए

साबिर ज़फ़र

अपनी यकजाई में भी ख़ुद से जुदा रहता हूँ

साबिर ज़फ़र

अब कहीं और कहाँ ख़ाक-बसर हों तिरे बंदे जा कर

साबिर ज़फ़र

उस जंगल से जब गुज़रोगे तो एक शिवाला आएगा

साबिर वसीम

राह में शहर-ए-तरब याद आया

साबिर वसीम

लोगो ये अजीब सानेहा है

साबिर वसीम

खिले हुए हैं फूल सितारे दरिया के उस पार

साबिर वसीम

जो ख़्वाब मेरे नहीं थे मैं उन को देखता था

साबिर वसीम

तिलिस्म टूट गया शब का मैं भी घर को चलूँ

साबिर अदीब

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