रात Poetry (page 4)

जब उन्ही को न सुना पाए ग़म-ए-जाँ अपना

ज़िया जालंधरी

गुमाँ था या तिरी ख़ुश्बू यक़ीन अब भी नहीं

ज़िया जालंधरी

दे गया दर्द-ए-बे-तलब कोई

ज़िया जालंधरी

छेड़ी भी जो रस्म-ओ-राह की बात

ज़िया जालंधरी

चाँद ही निकला न बादल ही छमा-छम बरसा

ज़िया जालंधरी

अपने अहवाल पे हम आप थे हैराँ बाबा

ज़िया जालंधरी

अजब कशाकश-ए-बीम-ओ-रजा है तन्हाई

ज़िया जालंधरी

लब पर दिल की बात न आई

ज़िया फ़तेहाबादी

हुस्न है मोहब्बत है मौसम-ए-बहाराँ है

ज़िया फ़तेहाबादी

फ़रिश्ते इम्तिहान-ए-बंदगी में हम से कम निकले

ज़िया फ़तेहाबादी

वो किताब

ज़ेहरा निगाह

तामील-ए-वफ़ा का अहद-नामा

ज़ेहरा निगाह

ये सच है यहाँ शोर ज़ियादा नहीं होता

ज़ेहरा निगाह

तिरा ख़याल फ़रोज़ाँ है देखिए क्या हो

ज़ेहरा निगाह

जुनून-ए-अव्वलीं शाइस्तगी थी

ज़ेहरा निगाह

ख़ुद-कलामी ख़ातून-ए-ख़ाना की

ज़ेहरा अलवी

नज़्म

ज़ीशान साहिल

नज़्म

ज़ीशान साहिल

नज़्म

ज़ीशान साहिल

किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को

ज़ीशान साहिल

ग़ुबार दिल से निकाला नज़र को साफ़ किया

ज़ीशान साहिल

जल-परी है तो वो तस्ख़ीर भी हो सकती है

ज़ीशान साजिद

जल-परी है तो वो तस्ख़ीर भी हो सकती है

ज़ीशान साजिद

क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कर

ज़ेबा

ऐसी तश्बीह फ़क़त हुस्न की बदनामी है

ज़ेबा

वो और मोहब्बत से मुझे देख रहा हो

ज़ेब ग़ौरी

उस के क़ुर्ब के सारे ही आसार लगे

ज़ेब ग़ौरी

नक़्श-ए-तस्वीर न वो संग का पैकर कोई

ज़ेब ग़ौरी

न अब्र से तिरा साया न तू निकलता है

ज़ेब ग़ौरी

ग़ार के मुँह से ये चट्टान हटाने के लिए

ज़ेब ग़ौरी

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