रात Poetry (page 6)

हाँ वो मैं ही था कि जिस ने ख़्वाब ढोया सुब्ह तक

ज़हीर सिद्दीक़ी

हमें ख़बर है कि हम हैं चराग़-ए-आख़िर-ए-शब

ज़हीर काश्मीरी

ये कारोबार-ए-चमन इस ने जब सँभाला है

ज़हीर काश्मीरी

वो महफ़िलें वो मिस्र के बाज़ार क्या हुए

ज़हीर काश्मीरी

तू अगर ग़ैर है नज़दीक-ए-रग-ए-जाँ क्यूँ है

ज़हीर काश्मीरी

तिरी चश्म-ए-तरब को देखना पड़ता है पुर-नम भी

ज़हीर काश्मीरी

इश्क़ इक हिकायत है सरफ़रोश दुनिया की

ज़हीर काश्मीरी

हमराह लुत्फ़-ए-चश्म-ए-गुरेज़ाँ भी आएगी

ज़हीर काश्मीरी

क़हर है ज़हर है अग़्यार को लाना शब-ए-वस्ल

ज़हीर देहलवी

मुँह छुपाना पड़े न दुश्मन से

ज़हीर देहलवी

साक़िया मर के उठेंगे तिरे मय-ख़ाने से

ज़हीर देहलवी

रक़ीबों को हमराह लाना न छोड़ा

ज़हीर देहलवी

रंज राहत-असर न हो जाए

ज़हीर देहलवी

इश्क़ और इश्क़-ए-शोला-वर की आग

ज़हीर देहलवी

हाए उस शोख़ का अंदाज़ से आना शब-ए-वस्ल

ज़हीर देहलवी

हाए काफ़िर तिरे हमराह अदू आता है

ज़हीर देहलवी

दिल को आज़ार लगा वो कि छुपा भी न सकूँ

ज़हीर देहलवी

बुतों से बच के चलने पर भी आफ़त आ ही जाती है

ज़हीर देहलवी

बिगड़ कर अदू से दिखाते हैं आप

ज़हीर देहलवी

ऐसे की मोहब्बत को मोहब्बत न कहेंगे

ज़हीर देहलवी

वो चाँदनी वो तबस्सुम वो प्यार की बातें

ज़हीर अहमद ज़हीर

ग़ुरूर-ओ-नाज़-ओ-तकब्बुर के दिन तो कब के गए

ज़हीर अहमद ज़हीर

जाँ रहे नोचते हयात के दुख

ज़फ़र रबाब

नक़ाब उस ने रुख़-ए-हुस्न-ए-ज़र पे डाल दिया

ज़फ़र मुरादाबादी

हर इंतिख़ाब यहाँ माज़ी-ओ-अक़ब का है

ज़फ़र मुरादाबादी

बात मेहंदी से लहू तक आ गई

ज़फ़र कलीम

दरिया गुज़र गए हैं समुंदर गुज़र गए

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

ये ज़िंदगी की आख़िरी शब ही न हो कहीं

ज़फ़र इक़बाल

जहाँ से कुछ न मिले हुस्न-ए-माज़रत के सिवा

ज़फ़र इक़बाल

चपातियाँ थीं बंधी पेट पर मगर शब-भर

ज़फ़र इक़बाल

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