रात Poetry (page 8)

जल्वा अफ़रोज़ है कअ'बे के उजालों की तरह

यज़दानी जालंधरी

जादा-ए-ज़ीस्त पे बरपा है तमाशा कैसा

यज़दानी जालंधरी

जो चला गया सो चला गया जो है पास उस का ख़याल रख

यासमीन हबीब

पढ़ चुके हैं निसाब-ए-तंहाई

यशब तमन्ना

निगाह-ए-बद-गुमाँ है और मैं हूँ

याक़ूब उस्मानी

दरून-ए-हल्का-ए-ज़ंजीर हूँ मैं

याक़ूब तसव्वुर

वो राहबर तो नहीं था इआदा क्या करता

याक़ूब आरिफ़

क़यामत है शब-ए-वादा का इतना मुख़्तसर होना

यगाना चंगेज़ी

काम दीवानों को शहरों से न बाज़ारों से

यगाना चंगेज़ी

रोज़ ओ शब फ़ुर्क़त-ए-जानाँ में बसर की हम ने

वज़ीर अली सबा लखनवी

दिल है ग़िज़ा-ए-रंज जिगर है ग़िज़ा-ए-रंज

वज़ीर अली सबा लखनवी

बुत-परस्ती से न तीनत मिरी ज़िन्हार फिरी

वज़ीर अली सबा लखनवी

बे-ताबी-ए-दिल ने ज़ार-पा कर

वज़ीर अली सबा लखनवी

बच कर कहाँ मैं उन की नज़र से निकल गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

कोह-ए-निदा

वज़ीर आग़ा

अंकबूत

वज़ीर आग़ा

अब दिन की बातें करते हैं

वज़ीर आग़ा

वो परिंदा है कहाँ शब को चहकने वाला

वज़ीर आग़ा

उम्र की इस नाव का चलना भी क्या रुकना भी क्या

वज़ीर आग़ा

सहर ने आ कर मुझे सुलाया तो मैं ने जाना

वज़ीर आग़ा

रंग और रूप से जो बाला है

वज़ीर आग़ा

इस गिर्या-ए-पैहम की अज़िय्यत से बचा दे

वज़ीर आग़ा

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला

वज़ीर आग़ा

बादल छटे तो रात का हर ज़ख़्म वा हुआ

वज़ीर आग़ा

पत्थर नज़र थी वाइ'ज़-ए-ख़ाना-ख़राब की

वसीम ख़ैराबादी

नज़्अ' में प्यार से क्यूँ पूछते हो तुम मुझ को

वसीम ख़ैराबादी

मौत आई मुझे कूचे में तिरे जाने से

वसीम ख़ैराबादी

क्या हुआ उस ने जो आशिक़ से जफ़ाकारी की

वसीम ख़ैराबादी

ज़िंदगी तुझ पे अब इल्ज़ाम कोई क्या रक्खे

वसीम बरेलवी

न जाने क्यूँ मुझे उस से ही ख़ौफ़ लगता है

वसीम बरेलवी

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