रात Poetry (page 64)

राहदारी में गूँजती नज़्म

फ़हीम शनास काज़मी

रस्ते में शाम हो गई क़िस्सा तमाम हो चुका

फ़हीम शनास काज़मी

बर्ग-ए-सदा को लब से उड़े देर हो गई

फ़हीम शनास काज़मी

तुझ बदन पर जो लाल सारी है

फ़ाएज़ देहलवी

ऐ जान शब-ए-हिज्राँ तिरी सख़्त बड़ी है

फ़ाएज़ देहलवी

रुस्वा भी हुए जाम पटकना भी न आया

एज़ाज़ अफ़ज़ल

दो घड़ी साए में जलने की अज़िय्यत और है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

ना-सज़ा आलम-ए-इम्काँ में सज़ा लगता है

एजाज़ सिद्दीक़ी

मिल सकेगी अब भी दाद-ए-आबला-पाई तो क्या

एजाज़ सिद्दीक़ी

नए सफ़र में जो पिछले सफ़र के साथी थे

एजाज़ उबैद

निशान-ए-ज़िंदगी

एजाज़ गुल

दुश्वार है अब रास्ता आसान से आगे

एजाज़ गुल

ढूँढता हूँ रोज़-ओ-शब कौन से जहाँ में है

एजाज़ गुल

ढूँढता हूँ रोज़-ओ-शब कौन से जहाँ में है

एजाज़ गुल

फूलों से होगी धूल जुदा देखते रहो

एजाज़ अासिफ़

चले थे घर से तो हम दर्द की दवा के लिए

एजाज़ अहमद एजाज़

शुऊर-ए-नौ-उम्र हूँ न मुझ को मता-ए-रंज-ओ-मलाल देना

एहतिशामुल हक़ सिद्दीक़ी

वादी-ए-शब में उजालों का गुज़र हो कैसे

एहतिशाम हुसैन

देख कर जादा-ए-हस्ती पे सुबुक-गाम मुझे

एहतिशाम हुसैन

अक़्ल पहुँची जो रिवायात के काशाने तक

एहतिशाम हुसैन

वफ़ा का अहद था दिल को सँभालने के लिए

एहसान दानिश

सोज़-ए-जुनूँ को दिल की ग़िज़ा कर दिया गया

एहसान दानिश

न सियो होंट न ख़्वाबों में सदा दो हम को

एहसान दानिश

जो ले के उन की तमन्ना के ख़्वाब निकलेगा

एहसान दानिश

अपनी रुस्वाई का एहसास तो अब कुछ भी नहीं

एहसान दानिश

क्या किसी की तलब नहीं होती

दिनेश ठाकुर

डरा रहे हैं ये मंज़र भी अब तो घर के मुझे

दिनेश नायडू

चाँद भी सितारों को साथ ले के चलता है

दिलकश सागरी

तमाशा मिरे आगे

दिलावर फ़िगार

मौसीक़ी से इलाज

दिलावर फ़िगार

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